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ग़ज़ल -- दुश्मनों से भी मुहब्बत करना .

2122-1122-22.

अपनी मंज़िल की जो हसरत करना
घर से चलने की भी हिम्मत करना
.
कोई तुझको जो अमानत सौंपे
जान देकर भी हिफ़ाजत करना
.
कहना आसान है करना मुश्किल
दुश्मनों से भी मुहब्बत करना
.
आज बचपन में है वो बात कहाँ
वक़्त बे-वक़्त शरारत करना
.
तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना
.
सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो
उसके दुख दर्द में शिरक़त करना
.
फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'
अपने माँ बाप की ख़िदमत करना
.
मौलिक व अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Rahul Dangi Panchal on July 16, 2015 at 7:20am
आदरणीय बहुत ही सुन्दर गजल हुई है बधाई स्वीकार करें ।


आज बचपन में है वो बात कहाँ
वक़्त बे-वक़्त शरारत करना
.
तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना

इन शे'रों ने तो कमाल कर दिया।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 16, 2015 at 3:27am

आदरणीय दिनेश भाई जी बहुत ही उम्दा और बेहतरीन ग़ज़ल हुई है. एक एक शेर कमाल का हुआ है.

आपकी बेहतरीन ग़ज़लों में शुमार होगी ये ग़ज़ल 

इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए दिल से दाद हाज़िर है......और ढेर सारी दुआ भी....


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 3, 2015 at 2:12am

ग़ज़ल की सीधापन भा गया, भाई दिनेशजी. दाद कुबूल कीजिये.

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on June 14, 2015 at 12:19am

तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना           जिंदाबाद शेर!
.
सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो
उसके दुख दर्द में शिरक़त करना          बेहतरीन!
.
फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'
अपने माँ बाप की ख़िदमत करना      बहुत सुन्दर

हार्दिक बधाई! दिनेश सर!

Comment by वीनस केसरी on June 12, 2015 at 11:36pm

बहुत उम्दा ग़ज़ल कही है दिनेश साहब बधाई हो ...

Comment by shree suneel on June 11, 2015 at 5:13pm
सिर्फ कहने को ही तेरा न हो वो
उसके दुख दर्द में शिरक़त करना...ख़ूब
इस ख़ूबसूरत ग़ज़ल के लिए बधाई आपको आदरणीय दिनेश जी. सादर
Comment by विनय कुमार on June 11, 2015 at 1:07am

बड़ी प्यारी और खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने , बधाई आदरणीय ..

Comment by Samar kabeer on June 10, 2015 at 11:06pm
जनाब दिनेश कुमार जी,आदाब,क्या बात है जनाब,कमाल कर दिया आपने,इस शानदार और कामयाब ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।

"फ़र्ज़ औलाद का यह होता 'दिनेश'"

इस मिसरे को इस तरह कर लें तो बहतर होगा :-

"फ़र्ज़ औलाद का होता है 'दिनेश'"
Comment by Rahul Dangi Panchal on June 10, 2015 at 4:53pm
.
तेरे भीतर का ख़ुदा जाग उठे
इतनी शिद्दत से इबादत करना लाजवाब वाह बहुत खूब
Comment by Madan Mohan saxena on June 10, 2015 at 4:26pm

कोई तुझको जो अमानत सौंपे
जान देकर भी हिफ़ाजत करना

वाह .... बहुत खूबसूरत अहसास पिरोये हैं आपने इस ग़ज़ल में आदरणीय। हार्दिक बधाई।

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