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ग़ज़ल -- कश्तियाँ बरसात में

2122-2122-2122-212

.

मुस्कुरा कर कह रही कुछ झुर्रियाँ बरसात में
देखीं थीं हमने कभी रंगीनियाँ बरसात में
.
आज का बचपन न जाने कौन सी चिन्ता में गुम
अब नहीं कागज़ की दिखतीं कश्तियाँ बरसात में
.
ज़ेह्न में रच बस गया है अब तो उनका ज़ायका
माँ खिलाती थी हमें जो पूरियाँ बरसात में
.
आज घर में शाम को चूल्हा जलेगा किस तरह
कह रही मजदूर की मजबूरियाँ बरसात में
.
मेरे घर की छत गिरी थी या गिरा था आसमाँ
जो हुईं उस रात थीं दुश्वारियाँ बरसात में
.
मौलिक व अप्रकाशित .

Views: 685

Comment

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Comment by narendrasinh chauhan on June 17, 2015 at 5:33pm

वाह बहुत ख़ूब

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 17, 2015 at 5:00pm

दिनेश भाई बरसात की पूरी का मजा ही कुछ और  है . बहुत बढ़िया,

Comment by Shyam Narain Verma on June 17, 2015 at 4:39pm
बहुत खूबसूरत अशआर ...दिल से बधाई 
Comment by Nilesh Shevgaonkar on June 17, 2015 at 3:36pm

वाह बहुत ख़ूब... पूरियां याद आ गयी 

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