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अंधी आस्था का फायदा (लघुकथा)

"सर, हमारे अमरूदों के बाग़ में कुछ लोग रोज़ शाम को शराब पीते हैं साथ में जुआ भी..."
"एफ.आई.आर. करवा दो|"
"कोई फायदा नहीं सर, उसमें कुछ पुलिस वाले भी हैं..."
"तो फिर ये मूर्ती ले जाओ, शराब की बदबू अगरबत्ती और फूलों की खुश्बू में बदल जायेगी|"

(मौलिक और अप्रकाशित)

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on July 8, 2015 at 2:03am

आदरणीय चन्द्रेश कुमारजी . दिल् से बधाई लीजिये इस लघुकथा केलिए ..

Comment by JAWAHAR LAL SINGH on July 2, 2015 at 7:04pm

बहुत सुन्दर! पर मूर्ति के सामने भी गांजा भांग तो लोग पीते ही हैं, बम बम भोले कहकर!

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 5:00pm

 बहुत बढ़िया ,आ.,, Chandresh Kumar जी ,,अगर बुराई को हटाने के लिए एक मूर्ति काफी है ,तो मेरे हिसाब से ये धन्धा नही है |

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on July 2, 2015 at 2:29pm

क्या बात है चंद्रेश जी!ये धंदा सदा से चलता आ रहा है खासकर अवैध कब्जे के लिए!  हार्दिक बधाई!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 2, 2015 at 2:21pm

इस उम्दा हल का जवाब नहीं ..बहुत बढ़िया ..इस सुंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 1, 2015 at 2:41pm

बहुत ही बढ़िया लघुकथा 

क्या गज़ब का हल निकाला है 

अपने शीर्षक को सार्थक करती बहुत अच्छी लघुकथा हुई है. आपको इस विशिष्ट प्रस्तुति के लिए बहुत बहुत बधाई 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on June 29, 2015 at 8:15pm

बहुत बढ़िया

क्या खूबसूरत हल ढूंढा है  i इसको कह्ते हैं कि  सांप मरे और लाठी न टूटे

Comment by kanta roy on June 28, 2015 at 11:18pm
वाह !! बहुत ही सुंदर लघुकथा बनी है ...धर्म के नाम पर तो कुछ भी करवा लिया जा सकता है । बधाई आपको आदरणीय चंद्रेश जी
Comment by विनय कुमार on June 28, 2015 at 11:03pm

बड़ा व्यवहारिक हल निकाला समस्या का , सुन्दर लघुकथा , बधाई इस रचना के लिए आदरणीय.

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