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तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा

2 1 2 2 2 1 2 1 2 2 2
तू वहाँ मशरूफ़ मैं यहाँ तन्हा
ये ज़मी तनहा वो' आसमाँ तन्हा

अब तेरी यादें यहाँ मचलती हैं
रह गया टूटा हुआ मकाँ तन्हा

हमने हर मौसम के' रंग देखें हैं
हम कभी तन्हा कभी समाँ तन्हा

चल दिए अरमां जला के' तिनकें सा
देर तक उठता रहा धुआँ तन्हा

हैं पड़ी ज़ंज़ीर दिल के पैरों में
हम अगर जाएँ तो अब कहाँ तन्हा

सोच कर ये रूह काँप जाती है
दिल में बस्ती बसे मकाँ तन्हा

जब न बंधन हो न ही रस्म कोई
हम मिलेंगे आपको वहाँ तन्हा


© परी ऍम. 'श्लोक'
"मौलिक व अप्रकाशित"

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Comment

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Comment by shree suneel on July 4, 2015 at 7:20am
अच्छी.. ख़ूबसूरत ग़ज़ल कही है आपने आदरणीया. . हार्दिक बधाइयाँ आपको.

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 3, 2015 at 6:22pm

आदरणीया , परि एम श्लोक जी , बहुत अच्छी लगी आपकी गज़ल । आपको हार्दिक बधाई । स्व. मीनाकुमारी जी की गज़ल की याद आगई । चाँद तन्हा है आसमाँ तन्हा ॥ 

Comment by Pari M Shlok on July 3, 2015 at 9:25am
maharshi tripathi जी आप सब का साथ रहा तो ग़ज़ल में निखार धीरे-धीरे आ ही जाएगा। बाकी कोशिशें ज़ारी हैं। टिप्पणी के लिए शुक्रगुज़ार हूँ
Comment by Pari M Shlok on July 3, 2015 at 9:24am
महिमा श्री जी आपकी स्नेहिक टिप्पणी के लिए शुक्रगुज़ार हूँ :)
Comment by Pari M Shlok on July 3, 2015 at 9:21am
मिथिलेश वामनकर जी आपकी टिप्पणी मार्गदर्शन करवाती है हमें बहुत ज़रूरत है आपके सुझाव की हर पोस्ट पर...... बहुत आभार आपका :)
Comment by Pari M Shlok on July 3, 2015 at 9:18am
Manoj kumar Ahsaas जी आपकी उत्साहवर्धक टिप्पणी हेतु दिल से आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 3, 2015 at 1:17am

बहुत बढ़िया प्रस्तुति 

हार्दिक बधाई 

Comment by maharshi tripathi on July 2, 2015 at 11:53pm

जब न बंधन हो न ही रस्म कोई
हम मिलेंगे आपको वहाँ तन्हा----वाह !!!,,बढ़िया गजल हुई ,,प्रयासरत रहे आ. Pari M Shlok जी |

Comment by MAHIMA SHREE on July 2, 2015 at 9:11pm

वाह..वाह..बहुत खूब.... बधाई

Comment by मनोज अहसास on July 2, 2015 at 5:36pm
बहुत खूब
सादर

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