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कव्वा चला शायर की चाल ......

2 2 2 1 / 2 2 2 2 / 2 1 222


दिल में शायरी का जब भी दोर उट्ठेगा
सबसे पहले तेरे नाम का शोर उट्ठेगा !!

पहली बारिश की रिमझिम शुरू क्या हुई
देख आज बगिया में नाच मोर उट्ठेगा !!

तेज हवाएँ तेरे इश्क़ में कुछ चलीं ऐसी

दिल में एहसासों का बबंडर जोर उट्ठेगा !!

जब आयेगा धुवाँ पड़ोस के घर के चुल्हे से
तभी मेरे हाथ से ये खाने का कोर उट्ठेगा !!

बचा कर रखना ये दिल मेरी तीरंदाजी से
वर्ना लूटने 'इंतज़ार' के दिल का चोर उट्ठेगा !!

*************************************************

मौलिक व अप्रकाशित

बे-बहर लाज़मी है  कृपया सुझाव दें

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Comment by Dr. Vijai Shanker on July 16, 2015 at 2:41am
सुन्दर, भावपूर्ण, बधाई, आदरणीय मोहन सेठी जी, सादर।
Comment by Sushil Sarna on July 14, 2015 at 8:01pm

सुंदर भावों की सुंदर ग़ज़ल   … बाकी गुणीजनों के सुझाव अवश्य निखार लाएंगे   .... हार्दिक बधाई आदरणीय जी। 

Comment by Rahul Dangi on July 14, 2015 at 6:08pm
अब काफिया ठीक है। सादर
Comment by विनय कुमार on July 14, 2015 at 6:04pm

// जब आयेगा धुवाँ पड़ोस के घर के चुल्हे से
तभी मेरे हाथ से ये खाने का कोर उट्ठेगा !! // , बहुत सुन्दर भाव , बधाई आदरणीय मोहन सेठी इंतज़ार जी..

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 14, 2015 at 3:32pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रोत्साहन की लिये हार्दिक आभार ....कोशिश जारी रहेगी सीखने की ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 14, 2015 at 3:30pm

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी हार्दिक आभार आप की टिप्पणी हेतु  ..अगली कोशिश में आप के सुझाव अनुसार ही कोशिश करता हूँ ...सादर 

Comment by Mohan Sethi 'इंतज़ार' on July 14, 2015 at 3:24pm

आदरणीय Rahul Dangi जी आभार आपने फिर से सोचने के लिये प्रोत्साहित किया तो कुछ शेर बदल दिये हैं ...अब काफ़िया और रदीफ़ तो ठीक होने चाहिये ...बाकी अगली ग़ज़ल में कोशिश जारी रहेगी ...सादर 

दिल में शायरी का जब भी जोर उट्ठेगा
सबसे पहले तेरे नाम का शोर उट्ठेगा !!

पहली बारिश की रिमझिम शुरू क्या हुई
देख आज बगिया में नाच मोर उट्ठेगा !!

तेज हवाएँ तेरे इश्क़ में कुछ चलीं ऐसी
दिल को एहसासों का पल झकझोर उट्ठेगा !!

तेरे जाने पे बेरौनक है ये महफ़िल सारी
बादल तन्हाईयों का अबके घनघोर उट्ठेगा !!

बचा कर रखना ये दिल मेरी तीरंदाजी से
वर्ना लूटने 'इंतज़ार' के दिल का चोर उट्ठेगा !!


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on July 14, 2015 at 1:33pm

आदरणीय मोहन जी बढ़िया प्रयास हुआ है गुनीजनों द्वारा साझा किये गए सुझाव पर अवश्य अमल करेंगे ऐसी आशा है. इस संभावनाओं भरे प्रयास पर बहुत बहुत बधाई 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on July 14, 2015 at 11:28am

आदरणीय मोहन भाई , ग़ज़ल के प्रयास के लिये बहुत बधाइयाँ ! आ. राहु भाई की बातों से सहमत हूँ , काफिया बन्दी सही नही है , दूसरी बात आप शुरुवात मे सामान्य सरल और मान्य बहों पर कोशिश करें  ।

1222   1222   1222   1222  या 2122   2122   2122   2122   ये आपको सरल लगेगा , अपने मन से बहर बनाना उचित नही है ।

Comment by Rahul Dangi on July 14, 2015 at 10:22am
आदरणीय शब्दों को गलत लिखने से उनका अर्थ बदल जाता है। दौर व दोर, कौर व कोर शब्दों के अर्थ दूर तलक समान नहीं है। कौर- निवाला,कोर-मुँह, किनारा अगर आपने अर्थ मुँह लिया है तो भी शे'र ठीक नहीं बैठता। दौर- समयावधी, दोर- फीता होता है देख लिजिएगा। सादर सन्रम।

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