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ग़ज़ल :- वाक़ई,ये ज़िन्दगी जंजाल है

फ़ाइलातुन फ़ाइलातुन फ़ाइलुन

क्या कहूँ तुमसे,ये मेरा हाल है
ख़ाली तर्कश,हाथ में इक ढाल है

रिश्तेदारों का ये इक जम्मे ग़फ़ीर
वाक़ई, ये ज़िन्दगी जंजाल है

क्यूँ रहे,इतनी ख़बर भी आप को
क्या महीना,कौन सा ये साल है

लग गई है उसको बीमारी अजीब
पास दौलत है मगर कंगाल है

न कोई तालीम है,न तरबियत
ये तो बस तहज़ीब का नक़्क़ाल है

जानवर की खाल दे देते हैं बस
और फिर ख़ाली,ये बैतुलमाल है

कुछ का कुछ आने लगा इसमें नज़र
आपके शीशे में देखो,बाल है

हज़रत-ए-"ख़ुशनूद" किस गिन्ती में हो
क़द्र उसकी है,जो माला माल है

शुक्र जितना भी करूँ कम है,"समर"
सर पे छत खाने को रोटी दाल है

"समर कबीर"
मौलिक/अप्रकाशित

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Comment by Samar kabeer on August 2, 2015 at 10:55pm
जनाब डॉ आशुतोष मिश्रा जी,आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुख़न नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on July 30, 2015 at 1:47pm

आदरणीय समर कबीरजी हमेशा की तरह यह आपकी उम्दा ग़ज़ल है ..लेकिन कठिन लगी मैं अभी कई शेरो पर उलझा हूँ ..फिर से पढ़ कर समझने की कोशिश करूंगा ..रचना पर प्रतिक्रियाओं और उनपर आपके जवाव से बहत कुछ सीखने को मिला खास रूप से न को २ मात्रिक लेने वाली बात यह जानकारी बिलकुल नयी लगी ..इस सुंदर रचना के लिए ह्रदय से बधाई रचना सादर 

Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 4:14pm
जनाब शिज्जु शकूर जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 4:12pm
बहना राजेश कुमारी जी आदाब, मतले के ऊला मिसरे की लय बेहतर है,सिर्फ सोचने का फ़र्क़ है,'न' अस्ल में 'नहीं' का मुख़फ़्फ़फ़(short form)है,जनाब 'महशर'रामपुरी का शैर है:-

"न हम समझे,न आप आए कहीं से
पसीना पोंछिये अपनी जबीं से"

ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 4:01pm
जनाब मिथिलेश वामनकर जी आदाब,मेरा ऐसा मानना है कि पाठक अगर कोई शैर पसंद करता है,या उसे समझना चाहता है तो उसे थोड़ी मिहनत तो करना ही चाहिये, ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 3:54pm
जनाब रवि शुक्ल जी आदाब, ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 3:52pm
जनाब राहुल डांगी जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 3:50pm
जनाब हर्ष महाजन जी आदाब,ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।
Comment by Samar kabeer on July 29, 2015 at 3:48pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब ग़ज़ल में शिर्कत और सुखन नवाज़ी के लिये आपका तहे दिल से शुक्रगुज़ार हूँ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on July 27, 2015 at 8:44pm

वाह कमाल की ग़ज़ल है जनाब समर साहब दिली दाद कुबूल फरमायें

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