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वंश वृद्धि (लघुकथा)

कवि सम्मेलन के आगाज़ के साथ ही नवांकुर कवि के कविता पाठ करते ही मरघट सा सन्नाटा पसर गया।बामुश्किल नामी कवी ने बात आगे बढ़ाते हुए कहा -
" इन्हें कलम चलानी तो आती नहीं फिर माहौल खराब करने के लिए यहाँ किसने आमन्त्रित किया हैं ?"
" अरे , शर्मा जी इन नवांकुरों को मैंने आमन्त्रित किया हैं ।इन्हें सिखाना भी तो जरुरी हैं।"
" ये केवल नाम बटोरना चाहते हैं ,लगन मेहनत से कोई वास्ता नहीं इनका।इन्हें मंच से हटाया जाय "
"शर्मा जी, ये हमे अपना आदर्श मानते हैं "
" तो हम ही मंच छोड़ देते हैं।"
"नहीं -नहीं आप सब ना जाए लेकिन मैं यह नहीं जानता था की आपका वंश वृद्धि से कोई सरोकार नहीं हैं

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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Comment by Archana Tripathi on August 4, 2015 at 3:23pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार।भविष्य में भी आपके मार्गदर्शन की आकांक्षी ।
Comment by Archana Tripathi on August 4, 2015 at 3:20pm
आदरणीय Tej veer singh ji रचना पर अमूल्य समय और टिप्पणी के लिए आभार आपका ।सदैव मार्गदर्शन करते रहिये ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 4, 2015 at 2:22pm

आदरणीया अर्चना जी, बहुत ही बढ़िया लघुकथा कही है आपने इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई !

Comment by TEJ VEER SINGH on August 4, 2015 at 10:21am

आदरणीय अर्चना जी, बहुत शानदार लघुकथा!हार्दिक बधाई!कला के हर क्षेत्र में हावी होती जा रही  राजनीति पर अच्छा कटाक्ष!

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