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तेरी आँखों की पलकों का, उठना बहुत ज़रूरी है।
इस चेहरे पर प्रेम पत्र है, पढना बहुत ज़रूरी है।।

कितनें सपनें इन आँखों नें, बुन रक्खे हैं तेरे लिए।
इन आँखों का हर इक पन्ना, खुलना बहुत ज़रूरी है।।

इस सीनें में जो इक दिल है, सरगम कोई सुनाता है।
धड़कन की इस मधुर राग को, सुनना बहुत ज़रूरी है।।

मेरे अधरों पर सदियों की, प्यास नें रेखाएं खींची हैं।
मधु सिंचन कर रेखाओं का, मिटना बहुत ज़रूरी है।।

इस बस्ती का घना अँधेरा, अपने चाँद को ढूंढ रहा है।
मनस् व्योम पर चंद्र किरण का, बिछना बहुत ज़रूरी है।।

त्याग दिया है इस जीवन की, अन्य सभी इच्छाओं को।
प्रीत अग्नि से मन जलता है, बुझना बहुत ज़रूरी है।।

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 27, 2016 at 1:39pm
आदरणीय सुनील जी सादर धन्यवाद
Comment by shree suneel on August 28, 2015 at 11:43pm
इस भावपूर्ण.. मनभावन प्रस्तुति के लिए आपको हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज जी.
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 5:38pm
जी अवश्य भंडारी सर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2015 at 10:18am

आदरणीय पंकज भाई , गज़ल पर आपका गम्भीर प्रयास बहुत अच्छा लगा । आगे से बह्र का उल्लेख किया कीजिये ताकि सीखने वालों को समझने मे आसानी हो , इस मंच मे हम सभी एक दूसरे से सीख रहे हैं , यही इस मंच का उद्देश्य भी है ॥

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:11pm
आदरणीय समर कबीर सर और वामनकर सर आप दोनों लोगों को प्रणाम। मैं ग़ज़ल/ गीत की पाठशाला का एक विद्यार्थी मात्र हूँ।
एक वादा ज़रूर है कि आप लोगों द्वारा और ओबीओ परिवार के सुझावों पर अवश्य कार्य करूंगा।
Comment by Samar kabeer on August 23, 2015 at 11:02pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी,आदाब,आप में एक बात ये अच्छी लगी कि आप एक के बाद एक अपना कलाम पोस्ट करते हैं ,इस प्रस्तुति हेतु भी बधाई स्वीकार करें ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 23, 2015 at 11:01pm

आदरणीय पंकज जी बिना वज्न/बह्र के ग़ज़ल पर टीप थोड़ा मुश्किल काम है. सादर 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:30am
बहुत बहुत आभार गोपाल सर; आगे से मीटर लिखा जायेगा।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 23, 2015 at 11:14am

अगर यह गजल है तो  इसका मीटर लिखना चाहिए था . पर इसमें   भाव व्यंजना बहुत ही अच्छी हुयी है  खासकर -मनस् व्योम पर चंद्र किरण का, बिछना बहुत ज़रूरी है।। आपको बधाई .

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 9:31am
सादर आभार, हर्ष महाजन सर

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