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हम "पत्थर" भी पूजे जाते

आ जाते इक बार अगर जो
तुम हमको भी चूमे जाते।
कई शिलाएं देव हुई हैं
हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।

राहों में बेजान पड़े हैं
अपनी गति को ढूंढ रहे हैं।
कभी इधर तो कभी उधर को
राहों में बस घूम रहे हैं।।

अपने सुर्ख गुलाबी वाले
मुझमें रंग जो भरके जाते।
कई शिलाएं देव हुई हैं
हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।1।।

ये तन है पर प्राण नहीं है
सांस का कुछ भी पता नहीं है।
दिल तो है पर शांत बहुत है
जीवित हूँ यह एक भ्रान्ति है।

अमृत रस अधरों को देते
हम धड़कन तो पाये होते।
कई शिलाएं देव हुई हैं
हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।2।।

यूँ तो गढ़ा गया घिस घिस कर
हाँ कुछ मलिन हुआ हूँ थककर।
बस अपनें मंदिर से अलग हूँ
निखरुँगा मैं तुझसे मिलकर।।

अपने मन मंदिर में हमको
दर थोड़ी सी देते जाते।
कई शिलाएं देव हुई हैं
हम "पत्थर" भी पूजे जाते।।3।।


मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 27, 2016 at 1:38pm
आदरणीय रवि शुक्ल सर सादर प्रणाम
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on February 27, 2016 at 1:38pm
आदरणीय सुनील सर सादर धन्यवाद
Comment by shree suneel on August 28, 2015 at 11:51pm
इस सुन्दर रचना के लिए बधाईयाँ आपको आदरणीय पंकज जी.
Comment by Ravi Shukla on August 26, 2015 at 2:33pm

आरदणीय पंकज जी बहुत खूब सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 9:15pm
आदरणीय मिथिलेश सर और समर कबीर सर दोनोंलोगिन को सादर धन्यवाद; मैं धीरे धीरे आप लोगों द्वारा प्रदत्त ऊर्जा के सहारे बढ़ रह हूँ।।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 25, 2015 at 10:36am
आदरणीय भंडारी सर उत्साहवर्धन और सुझाव दोनों के लिए हार्दिक आभार

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on August 25, 2015 at 10:26am

आदरणीय पंकज भाई , गीत रचना के लिये हार्दिक बधाई , गेयता और साधी जा सकती है थोड़े प्रयास से ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 23, 2015 at 11:02pm

आदरणीय पंकज जी, सुन्दर प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।

Comment by Samar kabeer on August 23, 2015 at 10:58pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी,आदाब,सुन्दर प्रस्तुति हेतु बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 11:27am
जी सादर गोपाल सर सादर प्रणाम।। ओबीओ पर इसी उद्देश्य से रचनाएँ भेजता हूँ कि कोई मेरी कमियों को पंक्ति दर पंक्ति बताता तो मैं सुधर कर पाता।।

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