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होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ

होश खोने की तलब है और मयखाना वहाँ।
है असम्भव आदतों को छोड़ दे पाना यहाँ।।

किस तरह तन्हा गुज़ारें ज़िंदगी का ये सफ़र।
नींद आँखों में नहीं कैसे हो सो जाना यहाँ।।

राह सुनी ही रही अब तक निगाहें हैं खुली।
आज भी हासिल रहा उनका नहीं आना यहाँ।।

चैन का आलम न पूछें नब्ज़ में तूफ़ान है।
है कठिन बरसात के मौसम को रुकवाना यहाँ।।

हसरतों की नाव सागर के हवाले छोड़ना।
एक मांझी की ख़ता मुश्किल है बतलाना यहाँ।।

कोई उनको बोलिये नैनों के सागर के बिना।
इस तरह "पंकज" का अब मुश्किल है खिल जाना यहाँ।।

मौलिक अप्रकाशित

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Comment by मिथिलेश वामनकर on August 23, 2015 at 11:13pm

आदरणीय पंकज जी, काफिया की इतनी कमी तो नहीं है कि पूरी ग़ज़ल में 'पाना' लगाय दिए है, बहरहाल इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 23, 2015 at 10:58pm
प्रणाम समर कबीर सर; हौसलाफजाई के लिए शुक्रिया
Comment by Samar kabeer on August 23, 2015 at 10:52pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी,आदाब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं।

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