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हरिया का बेटा हरिलाल
उम्र यही कुछ आठ साल
पढ़ता था तीसरी कक्षा में
आता था प्रथम प्रत्येक साल।।

बापू ने लगा दिया उसको
पास ही के इक भट्ठे पर
भरी जीवन का कुछ बोझा
लाद दिया उसके सर पर।।

वह बालक जिसकी उम्र यही
पढ़ लिख कर कुछ बननें की थी
जिसके जीवन की गिनती
मात्र अभी थी शुरू हुई।।

वह हाथ लिए फरसा झौव्वा
अब नित्य काम पर जाता था
बदले में रोटी की ख़ातिर
कुछ कमा धमा कर लाता था।।

समझाया मैंने हरिया को
विद्यालय भेजा कर बेटे को
पढ़ लिख कर भाग्य संवर जाता
जीवन उसका भी निखर जाता।।

हरिया ने मुझसे कुछ न कहा
बस ख़ामोशी से सुनता रहा
आँखों से बहती दुःख नदिया
गमछे से उसने बाँध दिया।।

इक प्रश्न मेरे मन को तब से
उद्वेलित करता है जिसे आज
प्रिय आप से पूछ रहा हूँ मैं-

उस हरिलाल से लाल कई
मजदूर बनें क्या उचित है ये ?

नहीं सर्वथा अनुचित है

वे भी हैं लाल भारती के
उनका भी है अधिकार यहाँ
वे भी हैं भारत के भविष्य
फिर उनको क्यों
दुत्कार यहाँ।।

उनको भी शिक्षा दो शायद
उनमें कोई लालबहादुर हो
उनको भी शिक्षा दो शायद
उनमे कोई भाभा जैसा हो।।
हे प्रियवर आप ज़रा सोचें
इस बालक की पीड़ा को
अपना अधिकार मांगने पर
मालिक ने दागा हो जिसको।।

उस हरिलाल की ख़ता भी बस
इतनी थी कि उसने अपनी
मज़दूरी पूरी माँगा और
बदले में आग की भीख मिली।।

कुंठित मन घायल हुआ अंततः
परिणाम सामने ये आया
उस होनहार बालक को किसी ने
बन्दूक हाथ में पकड़ाया।।

मेरा आह्वान सभी से है
हमको अन्याय रोकना है
हर हरिलाल का अधिकार
उसको वापस दिलवाना है।।

वर्ना दिन ऐसा आयेगा
संघर्षयुक्त धरती होगी।
हर गाँव रक्त रंजित होगा
हर गली गली हिंसा होगी।।

(1996)
मौलिक अप्रकाशित

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Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on August 27, 2015 at 10:38pm
आदरणीय

वामनकर सर,राजेश कुमारी जी, कान्ता रॉय जी एवम् हर्ष महाजन जी आप सभी का सादर अभिवादन

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on August 27, 2015 at 10:13pm

बहुत अच्छी संदेशपरक कविता बहुत बहुत बधाई आपको आ० पंकज जी 

Comment by Harash Mahajan on August 26, 2015 at 1:41pm

आदर्नीत Pankaj Kumar Mishra  जी ..वाह अपनी कविता द्वारा जागृति !! बेहद खूबसूरत भाव....बधाई !!

Comment by kanta roy on August 26, 2015 at 1:24pm
वाह !!!! उस वक्त से , इस वक्त को, आनेवाले वक्त के लिए चेतना जगाती हुई एक सार्थक रचना कर्म । बधाई आदरणीय पंकज जी

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on August 26, 2015 at 12:51pm

आदरणीय पंकज जी बाल श्रमिक विषय पर पद्यमय दास्ताँ हो गई है. इस प्रस्तुति पर आपको बहुत बहुत बधाई 

कृपया ध्यान दे...

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