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ग़ज़ल - जैसे अपना बयान छोड़ गये ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212  112/22

ज़ख़्म  सूखे निशान छोड़ गये

जैसे अपना बयान छोड़ गये

 

लौट के यूँ गये मेरे दिल से

मानो ख़ाली मकान छोड़ गये

 

सारी खुश्बू हवायें ले के गईं  

ये भी सच है कि भान छोड़ गये

 

राग खुशियों के छिन्न भिन्न किये

मित्र, ग़मगीन तान छोड़ गये

 

उड़ गये जब परिंदे बाग़ों से

पीछे सब सून सान छोड़ गये 

 

हाले दिल क्या बयान कर पाते ?

हम से कुछ बे ज़ुबान छोड़ गये

 

खुद चढ़ाई चढ़े हैं वालिद , अब     

तिफ्ल खातिर ढलान छोड़ गये

******************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

Views: 977

Comment

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Comment by Harash Mahajan on September 4, 2015 at 8:42am
वाह आदरणीय भंडारी जी काफी दिनों बाद आपकी ग़ज़ल सामने आयी । कितना मुखर कहते हैं आप "खुद चढ़ाई चढ़ें....." बहुत खूब । दाद सर । सादर !!!
Comment by kanta roy on September 4, 2015 at 12:08am
बहुत ही मायूस से भाव है गजल में । किसी का जाना बहुत बूरा होता है । दिल को ये सन्नाटा काटने को दौडता है सही कहा है आपने कि


सारी खुश्बू हवायें ले के गईं
ये भी सच है कि भान छोड़ गये

राग खुशियों के छिन्न भिन्न किये
मित्र, ग़मगीन तान छोड़ गये

उड़ गये जब परिंदे बाग़ों से
पीछे सब सून सान छोड़ गये
..... बेहतरीन दिल को छूती हुई गजल । बधाई आपको आदरणीय गिरीराज भंडारी जी ।
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 3, 2015 at 11:05pm

आदरणीय गिरिराज जी, ख़ूबसूरत अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल कीजिए


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 3, 2015 at 6:22pm

आदरणीय गिरिराज सर, बहुत ही शानदार ग़ज़ल हुई है. शेर दर शेर दाद कुबूल फरमाएं.

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on September 3, 2015 at 4:42pm
आदरणीय उम्दा ग़ज़ल के लिये बधाई। शब्द सून सान थोड़ा खटक रहा है। मेरे विचार से यह सुनसान होता है । और यह एक शब्द है अलग अलग पढ़ने का प्रचलन नहीं है।
Comment by gumnaam pithoragarhi on September 3, 2015 at 2:43pm

नमस्कार सर जी ,,,,,,, अच्छी ग़ज़ल है ,,,,,,,,,,, पर शायद तकाबुले रदीफेन का दोष कुछ शेरो में दिख रहा है

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