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मेरे शानों पे .....

मेरे शानों पे .....

साँझ होते ही मेरे तसव्वुर में
तेरी बेपनाह यादें
अपने हाथों में तूलिका लिए
मेरी ख़ल्वत के कैनवास पर
तैरती शून्यता में
अपना रंग भरने आ जाती हैं

रक्स करती
तेरी यादों के पाँव में
घुंघरू बाँध
अपने अस्तित्व का
अहसास करा जाती हैं

मेरी रूह की तिश्नगी को 

अपनी दूरी से
और बढ़ा जाती हैं

मेरे अश्क
मेरी पलकों की दहलीज़ पे
चहलकदमी करने लगते हैं

न जाने कब
सियाह तारीक को चीरता
तेरी याद का जुगनू
मेरे सिरहाने तू बन कर

तमाम शब मुझसे बतियाता है

फिर मेरे चहरे पे
तेरी बेपरवाह ज़ुल्फ़ों के भूले स्पर्श को
इक सांस दे जाता है

सोयी तड़प को
नया आगाज़ दे जाता है

मैं अपने अंधेरों में
ग़ुम हो जाता हूँ
ख़ुद को ख़ुद से जुदा पाता हूँ
मगर चाह कर भी
खुद को तुझसे जुदा कहाँ कर पाता हूँ

मेरी नींदें भी
मुझसे अदावत कर बैठी हैं
आगोश में न लेने की
ख़िलाफ़त कर बैठी हैं
नर्म आरिज़ों की वो गर्मीं
मेरी शबों को तपिश देती है


तेरी यादों का सैलाब
मेरी आँखों को सुर्ख कर जाता है
हर करवट तू मेरे साथ होती है
आज भी

मेरे शानों पे तेरी याद
सिर रख के सोती है

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on September 9, 2015 at 12:16pm

अय हय ! 

भावों को दिल से शब्दों में उकेर दिया आपने आदरणीय.. बहुत खूब !

शुभ-शुभ


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 8, 2015 at 10:34pm
बहुत बढ़िया आदरणीय सुशील सर बहुत बहुत बधाई इस रचना के लिए
Comment by Sushil Sarna on September 8, 2015 at 7:57pm

आदरणीय मिथिलेश जी रचना पर आपकी स्नेहिल उपस्थिति ने मेरे सृजन कर्म को जो मान दिया है उसके लिए आपका तहे दिल से शुक्रिया। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on September 8, 2015 at 7:02pm
आदरणीय सुशील सरना सर, बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति। रचना के ख्यालों को बड़े सुन्दर और सार्थक शब्द मिले है। इस प्रस्तुति पर बहुत बहुत बधाई।
Comment by Sushil Sarna on September 8, 2015 at 3:12pm

आदरणीय हर्ष महाजन जी रचना पर आपकी ऊर्जावान प्रतिक्रिया से मेरे सृजन बल मिला है।आपका तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by Harash Mahajan on September 8, 2015 at 1:00pm

"

मेरे अश्क
मेरी पलकों की दहलीज़ पे
चहलकदमी करने लगते हैं

न जाने कब
सियाह तारीक को चीरता
तेरी याद का जुगनू
मेरे सिरहाने तू बन कर

तमाम शब मुझसे बतियाता है

फिर मेरे चहरे पे
तेरी बेपरवाह ज़ुल्फ़ों के भूले स्पर्श को
इक सांस दे जाता है

सोयी तड़प को
नया आगाज़ दे जाता है"....वाह बहुत ही मर्म लिए आपकी नज़्म में दिल में उतरती हुई...बहुत बहुत बधाई  आदरणीय Sushil Sarna  जी !!! सादर !!!

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