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हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है (ग़ज़ल)

1222  1222  122

मेरा दिल प्यार का भूखा बहुत है

ये दरिया है,मगर प्यासा बहुत है

-

मुकद्दर ने हमें मारा बहुत है

ज़माने से मिला धोखा बहुत है

-

उठाएँ हम भला हथियार कैसे

वो दुश्मन है,मगर प्यारा बहुत है

-

छुपाने का हुनर क्या खूब ढूँढा

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है

-

डराओ मत उसे क़ानून से तुम

कि उसके जेब में पैसा बहुत है

-

यूँ कहने को सितारे साथ हैं "जय"

मगर वो चाँद भी तनहा बहुत है

(मौलिक व अप्रकाशित)

*

*

~जयनित~

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Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on May 5, 2016 at 6:43pm
आप सब को बहुत-बहुत धन्यवाद।
Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on September 29, 2015 at 12:24pm
वाह...बहुत बेहतरीन..हार्दिक बधाई।
Comment by Ravi Shukla on September 28, 2015 at 2:17pm

आदरणीय जयनितजी, अच्छी  ग़ज़ल कही है , बधाई स्वीकार करें ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 28, 2015 at 10:46am

आदरणीय जयनित भाई , बहुत अच्छी  ग़ज़ल कही है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on September 26, 2015 at 10:01am
अच्छे अश’आर हुए हैं। दाद कुबूल करें
Comment by जयनित कुमार मेहता on September 25, 2015 at 2:39pm

बहुत शुक्रिया, बड़ी मेहरबानी..

मेरे पोस्ट पे हुज़ूर आप सब आये..! ;-)

कृपया यूँ ही अपना स्नेह बनाये रखें..

Comment by gumnaam pithoragarhi on September 25, 2015 at 1:03pm

छुपाने का हुनर क्या खूब ढूँढा

हो ग़म तो शख़्स वो हँसता बहुत है

-

वाह आदरणीय जयनित भाई बहुत बढ़िया मुबारक़बाद कुबूल करें,,,,,,,,,, वाह भाई जी खूब ,,,,,

Comment by Shyam Narain Verma on September 25, 2015 at 11:41am
बहुत सुन्दर गजल।  ढेरों दाद कुबूल करें। सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on September 24, 2015 at 11:19pm
वाह आदरणीय जयनित भाई बहुत बढ़िया मुबारक़बाद कुबूल करें
Comment by जयनित कुमार मेहता on September 24, 2015 at 4:30pm

शुक्रिया आपका आदरणीय मिथिलेश जी..

कृपया ध्यान दे...

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