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मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.................(डॉ० प्राची सिंह)

बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा
चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा..

कँपकँपा रहे अधर नयन मुँदे मुँदे
साँस की छुअन से ही पुकार लूँ ज़रा..

शब्द शून्य सी फिज़ा हुई है पुरअसर 
सिहरनों से रूह को सँवार लूँ ज़रा..

चाँद भी पिघल के कह रहा मचल मचल 
चाँदनी में प्यार का निखार लूँ ज़रा..

अब महक उठे बहक उठे प्रणय के पल
इन पलों में ज़िन्दगी गुज़ार लूँ ज़रा..

वक्त रुक! न धड़कनों सा तेज़ तू मचल
ख्वाब एक यकीन में उतार लूँ ज़रा..

झूठ है, तो क्या हुआ? है ज़िन्दगी मगर
मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.

(मौलिक और अप्रकाशित)

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Comment

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सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on February 9, 2016 at 10:35pm

आदरणीया प्राची जी, आपकी ग़ज़ल क्या पटल पर ही व्यतिक्रम बनाता हुआ आ रहा हूँ. ग़ज़ल पर हुआ प्रयास आश्वस्तिकारी है, इसमें संदेह नहीं. आदरणीया राजेश कुमारीजी ने ग़ज़ल के व्याकरण के हवाले से सटीक व्याख्या की है. उनके सुझावों पर ध्यान देना उचित होगा. एक अत्यंत आश्वस्तिकारी प्रयास केलिए हार्दिक शुभकामनाएँ

 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 2, 2015 at 12:25pm

आदरणीया प्राची जी , बहुत दिनो के बाद आपकी गज़ल पढ़ने मिली , और क्या खूब मिली ! लाजवाब , हर शे र बेमिसाल है । दिली बधाइयाँ स्वीकार करें ॥
झूठ है, तो क्या हुआ? है ज़िन्दगी मगर
मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.   --  ऐसा लगा जैसे मेरी बात कह दी आपने , वाह ॥

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 2, 2015 at 11:19am

कुछ दिनों पूर्व मंच पर ये चर्चा हुयी थी कि..क्या हिंदी की गज़ल उर्दू की गज़ल की तरह ही समर्थ है????

मुझे लगता है,इसका उत्तर इस बेहतरीन हिंदी गज़ल ने दे दिया है!

आभार सहित हार्दिक बधाई आदरणीया!

सादर!

Comment by Dr Ashutosh Mishra on October 2, 2015 at 10:33am

आदरणीया प्राची जी पहले तो आपको इस शानदार हिंदी ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई ..कभी मुकेश के अंदाज में गुनगुनाया कभी हेमंड डा के अंदाज में वक्त रुक! न धड़कनों सा तेज़ तू मचल
ख्वाब एक यकीन में उतार लूँ ज़रा.. एक पर मैं भी अटका था लेकिन आदरणीया राज जी की प्रतिक्रिया में यह बिंदु शामिल था  पहले शेरे पर मेरे मन में उठे प्रश्न पर आदरणीय समीर जी और आदरणीया राज जी की प्रतिक्रिया पहले ही हो चुकी है ..आज एक लम्बे अरसे के बाद आपकी ग़ज़ल पढने को मिली मंत्रमुग्ध करती रचना ..माथे पर बल डालती रचनाये पढ़ते पढ़ते कभी इस तरह की सीधे दिल में उतरने वाली कोई रचना मिल जाती है ..इस शानदार रचना के लिए एक बार पुनः बधाई के साथ साथ सादर 

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on October 2, 2015 at 9:48am
यद्यपि;

//बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा//

एक ऐसे भाव को अभिव्यक्त कर रहा, जिसमें "बादलों के घूँघट से रूप रस उधार माँगा जा रहा।।

किन्तु;

लोगों तक यदि भाव नहीं पहुँच रहा तो निम्नवत् संशोधन समुचित और आपके मूल भावों के ही अनुरूप रहेगा-

बादलों की ओट को उघार लूँ ज़रा।
चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा।।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 2, 2015 at 9:31am

प्रिय प्राची जी ,सबसे पहले तो मखमली भाव से समृद्ध इस हिंदी ग़ज़ल के लिए बहुत बहुत बधाई लीजिये अब शेर दर शेर कुछ कहना चाहूंगी 

बादलों की ओट से उधार लूँ ज़रा
चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा..---ये शेर बहुत बेहतर हो सकता था पहले मिसरे में बादलों की ओट से उधार लेने की बात है किन्तु क्या उधार लेना है वो स्पष्ट नहीं है या तो सानी में ही ये बात क्लीयर हो जाती 

एक कोशिश की है जरा देखिये ----


चाँद नूर तेरा मैं उधार लूँ जरा .

बादलों की ओट से निहार  लूँ ज़रा

------या ---

बादलों से लम्हा इक उधार लूँ जरा 

चाँद आज तुझको मैं निहार लूँ ज़रा..

कँपकँपा रहे अधर नयन मुँदे मुँदे
साँस की छुअन से ही पुकार लूँ ज़रा..----वाह्ह्ह्ह 

शब्द शून्य सी फिज़ा हुई है पुरअसर 
सिहरनों से रूह को सँवार लूँ ज़रा..--बहुत खूब 

चाँद भी पिघल के कह रहा मचल मचल 
चाँदनी में प्यार का निखार लूँ ज़रा..वाह 

अब महक उठे बहक उठे प्रणय के पल
इन पलों में ज़िन्दगी गुज़ार लूँ ज़रा..क्या बात है 

वक्त रुक! न धड़कनों सा तेज़ तू मचल
ख्वाब एक यकीन में उतार लूँ ज़रा..--इसमें बह्र गडबडा रही है ----ख़्वाब एक के बाद कोई दीर्घ आना था 

झूठ है, तो क्या हुआ? है ज़िन्दगी मगर
मत कहो! कि सत्य फिर विचार लूँ ज़रा.---अतिसुन्दर 

इस सुन्दर प्रयास पर बहुत- बहुत बधाई प्रिय प्राची जी 

Comment by मनोज अहसास on October 1, 2015 at 5:27pm
सादर आभार
मार्गदर्शन के लिए
आदरणीया

सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 1, 2015 at 9:07am

प्रिय मनोज भाई जी,

ग़ज़ल पर आपकी महीन पाठकीय दृष्टि और कथ्य संवेदनाओं को आत्मसात कर आस्वादन करने के लिए हार्दिक धन्यवाद.

मतले में यकीनन आप 'उधार' शब्द को लेकर कुछ व्याख्या चाहते होंगे..

Non-possession और gratitude के भाव से किसी दुर्लभ प्रतीत होती वस्तु विशेष के क्षणिक सामीप्य की चेष्टा...'उधार' ही होगी न !!! :))

//और वरिष्ठ साहित्यकारों की रचना पर टिप्पणी करने से बचत भी हूँ//..... अरे भाई यहाँ पर तो हम सभी सीख रहे हैं और ये परस्पर सीखना सिखाना को तो मंच का मूल है... वरिष्ठता और लघुता की भावना से ओबीओ अस्पृष्ट है यहाँ सिर्फ रचनाएं ही सम्मान पाती हैं या सुधार के इंगित की जाती हैं. आप रचनाओं के दायरे में बेबाकी से टिप्पणी करें..(बिना रचनाकार को देखे) यही अपेक्षित भी है 


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Dr.Prachi Singh on October 1, 2015 at 8:55am

ग़ज़ल आपको मोह सकी जानना प्रयास के प्रति आश्वस्तिकारी है..कथ्यअनोमोदित करने के लिए आभार आ० समर कबीर जी 

Comment by मनोज अहसास on September 29, 2015 at 5:10pm
आदरणीया
आपकी ग़ज़ल को कई बार पढ़ा
खाली बहुत खूब कहकर नहीं रहा जा सकता
और ज्यादा शब्द नहीं है पास जो कुछ कह सकूँ ज्यादा
और वरिष्ठ साहित्यकारों की रचना पर टिप्पणी करने से बचत भी हूँ

ऐसा लगा कि नीली रौशनी मे शब्द मदहोश होकर किसी की प्रतीक्षा कर रहे है और खुद का अर्थ खुद ही बता रहे है
जैसे कोई बहुत इंतज़ार के बाद क्षणिक मिलन को भरपूर जी रहा हो
और ऐसा लगा कि दुनिया में प्यास की सत्यता ज्ञान की तृप्ति पर भारी होनी चाहिए
और किसी में बंध जाने में कितना सुख है

बहुत बहुत् आभार
और मतले की थोड़ी व्याख्या निवेदित है
सादर

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