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''फ़लक पे सितारे चमक करके रोये'' (गज़ल)

१२२  /१२२  /१२२  /१२२

उजाले बहाये धधक करके रोये

फ़लक पे सितारे चमक करके रोये।

 

कोई चाँदनी बेवफ़ा तो थी वर्ना

क्यूँ सीना जलाये दहक करके रोये।

 

नमक इश्क का पी बहुत थीं ये आँखें

अदा अब ये सारे नमक करके रोये।

 

जो गम हम मिटाने चले जाम उठाने  

तो पैमाँ भराये छलक करके रोये।

तेरी खुश्बुओं से घर आँगन भराया

शजर फूल सारे महक करके रोये।

 

सलामत रहे तू दुआ है  हमारी

ये सुन गम के मारे फ़फक करके रोये।

 

बहुत शादमां थे गले से लगाकर

ता उम्र अब शरारे दहक करके रोये।

है सुनता बहुत आसमां भी हमारी

घटा घिर-घिराये चमक करके रोये।

 

मुहब्बत सफर है, नहीं कोई मंजिल

यही पा हमारे टपक करके रोये।

 

वफ़ा का हमारी सिला ये मिला है

नजर और नजारे फ़लक कर के रोये।

 

________________________________

मौलिक व् अप्रकाशित © ‘जान’ गोरखपुरी

________________________________

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Comment

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Comment by jaan' gorakhpuri on October 8, 2015 at 8:41pm
हार्दिक आभार आ.रामअवध जी।मार्गदर्शन बनाये रक्खे। सादर।
Comment by Ram Awadh VIshwakarma on October 8, 2015 at 12:26pm
बधाई गजल में सफल प्रयोग के लिये
Comment by jaan' gorakhpuri on October 8, 2015 at 7:57am
तहेदिल से सुखन्वजी के लिए शुक्रिया आ.समर सर।नमन।
Comment by Samar kabeer on October 7, 2015 at 10:51pm
जनाब "जान" गोरखपुरी जी ,आदाब,वाह,बहुत ख़ूब,अच्छी ग़ज़ल कही है आपने,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 10:14pm

प्रस्तुत गज़ल में दो काफ़िया को साथ लेकर निभाने का प्रयास किया है! गुनीजनों से निवेदन है कि जो कुछ त्रुटी रह गयी है बताने की कृपा करें!

Comment by jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 10:07pm

आ० श्याम नारायण वर्मा जी हार्दिक आभार!

सादर!

Comment by jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 10:06pm

आ० हर्ष महाजन सरजी सुखन्न्वाजी के लिए तहेदिल से शुक्रिया!आभार!

Comment by jaan' gorakhpuri on October 7, 2015 at 10:05pm

तहेदिल से आभार आ० कांता जी,गज़ल में सबसे मूल तत्व अहसास ही है ...आपकी प्रशस्ति प़ाकर रचनाकर्म सफल हुआ!

सादर!

Comment by Shyam Narain Verma on October 7, 2015 at 5:37pm

अच्छी गजल के लिये बधाई

सादर 

Comment by Harash Mahajan on October 7, 2015 at 1:34pm

"

है सुनता बहुत आसमां भी हमारी

घटा घिर-घिराये चमक करके रोये।"
बहुत ही सुंदर प्रस्तुति आ० क्रिशन जी !1


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