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ग़ज़ल -तेरी सुहबत में ऐ पत्थर, पिघलना छोड़ देंगे क्या - ( गिरिराज भंडारी )

1222     1222        1222      1222  

बहलने की जिन्हें आदत, बहलना छोड़ देंगे क्या

तेरे वादों की गलियों में, टहलना छोड़ देंगे क्या

 

तू आँखें लाल कर सूरज, ये हक़ तेरा अगर है तो  

तेरी गर्मी से डर, बाहर निकलना छोड़ देंगे क्या

 

कहो आकाश से जा कर, ज़रा सा और ऊपर हो

हमारा कद है ऊँचा तो , उछलना छोड़ देंगे क्या

 

दिया जज़्बा ख़ुदा ने जब कभी तो ज़ोर मारेगा

तेरी सुहबत में ऐ पत्थर, पिघलना छोड़ देंगे क्या  

 

ये सूरज चाँद तारे हैं सभी ज़ेरे असर कुदरत

तेरे घर में अँधेरा है , तो ढ़लना छोड़ देंगे क्या

 

हक़ीकत ! तल्ख़ियाँ सारी बजा तो हैं तेरी लेकिन

मेरे अरमाँ हैं सदियों के, मचलना छोड़ देंगे क्या

 

किसे हमवार मिलती है कोई भी राह मंज़िल की

गिरा ले लाख ऐ क़िस्मत, सँभलना छोड़ देंगे क्या

 

यही हैं तिफ्ल वो सारे , पिलाये ज़ह्र थे जिनको

ये मौक़ा पा गये हैं तो , उगलना छोड़ देंगे क्या

 

सरकती हैं, बदलतीं है, अगर है ज़िन्दगी जीवित   

वे जिनकी सांसें जारी हैं, बदलना छोड़ देंगे क्या

*********************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by amod shrivastav (bindouri) on October 21, 2015 at 4:47pm
क्या बात है बहुत खूब सादर बधाई
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on October 21, 2015 at 4:29pm

वासी तो सभी शेर काबिले तारीफ हैं ही पर 

तू आँखें लाल कर सूरज, ये हक़ तेरा अगर है तो  

तेरी गर्मी से डर, बाहर निकलना छोड़ देंगे क्या

 

कहो आकाश से जा कर, ज़रा सा और ऊपर हो

हमारा कद है ऊँचा तो , उछलना छोड़ देंगे क्या

मुझे बहुत अच्छी लगी ...दाद कबूलें 

Comment by Krish mishra 'jaan' gorakhpuri on October 21, 2015 at 4:19pm
बहुत बेहतरीन ग़ज़ल हुयी है आदरणीय..तहेदिल से दाद ही दाद पेश है।
सादर।
Comment by pratibha pande on October 21, 2015 at 1:19pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें आदरणीय गिरिराज जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:34pm

आदरणीया राजेश जी , हौसला अफज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:33pm

आदरणीय रवि शुक्ला भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ।

आपकी वो सलाह जो आपने नही दी है , वो मुझे मंज़ूर है , मै तदानुसार परिवर्तन कर लूंगा , क्योकिं वही व्याकरण सम्मत मुझे भी लग रहा है , आपका आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:31pm

आदरणीय मिथिलेश भाई , आपकी सराहना और उत्साह वर्धन के लिये हृदय से आभारी हूँ ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:30pm

आदरणीय बड़े भाई गोपाल जी , आपकी स्नेहिल सराना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:29pm

आदरणीय जय प्रकाश भाई , हौसला अफज़ाई का बहुत शुक्रिया


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 21, 2015 at 12:28pm

आदरणीय जयनित भाई , आपकी स्नेहिल सराहना के लिये आपका हृदय से आभारी हूँ ।

कृपया ध्यान दे...

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