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अश्कों का मैं गरीब के सागर समेट लूँ (तरही ग़ज़ल 'राज ')

२२१  २१२१  १२२१   २१२

बलवाइयों के होंसले जाकर समेट लूँ

मासूम गर्दनों पे हैं  खंजर समेट लूँ

 

आये न बददुआ कभी मेरी जुबान  पे

गलती से आ गई तो भी अन्दर समेट लूँ

 

उम्मीद से बनाया हैं बच्चे ने रेत का   

लहरों वहीँ रुको मैं जरा घर समेट लूँ

 

परवाज आज भर रहा पाखी नई नई 

आँखों की चिलमनों में ये मंजर समेट लूँ

 

जिन्दा रहे यकीन मुहब्बत के नाम पर  

फेंके हैं दोस्तों ने जो पत्थर समेट लूँ

 

  ए तितलियों सँभाल के रक्खा उन्हें कहाँ 

 यादें वो बचपने की मैं आकर समेट लूँ

 

जद्दो जहद में जीस्त की हासिल हुए मुझे

उस पर हुजूर चाहते मैं पर समेट लूँ 

मुझको मेरे खुदा तू जरा बख्श दे वजूद

अश्कों का मैं गरीब के सागर समेट लूँ 

मौलिक एवं अप्रकाशित 

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 26, 2015 at 9:15am

आ० समर कबीर भाई जी ,ग़ज़ल आपको पसंद आ गई आपकी कसौटी पर खरी उतरी मेरी मेहनत सफल हो गई इस होंसलाफ्जाई के लिए आपका तहे दिल से बहुत बहुत बहुत शुक्रिया| 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 26, 2015 at 9:13am

प्रिय प्रतिभा पाण्डेय जी ,आपका तहे दिल से आभार |


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 26, 2015 at 9:12am

आ० रवि शुक्ल जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ इस जर्रानवाजी  का  दिल से बहुत- बहुत शुक्रिया  आभार| 

Comment by Samar kabeer on October 25, 2015 at 11:23pm
बहना राजेश कुमारी जी,आदाब,इस मुश्किल ज़मीन में कितनी आसानी के साथ अच्छे अशआर की माला बना दी ,हर शैर अपनी जगह सटीक है ख़ास तौर से "घर समेट लूँ" वाला शैर आपकी फ़नकारी की दलील में पेश किया जा सकता है क्यूँकि इस क़ाफ़िये को इस ज़मीन में बांधना आसान नहीं था लेकिन आपने बड़ी आसानी से इसे बाँध लिया,इसकी दाद अलग से,इस अच्छी ग़ज़ल के लिये शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by pratibha pande on October 25, 2015 at 1:54pm

  ए तितलियों सँभाल के रक्खा उन्हें कहाँ 

 यादें वो बचपने की मैं आकर समेट लूँ .......      भा गई ये  पंक्तियाँ आदरणीया बधाई आपको  

 

Comment by Ravi Shukla on October 25, 2015 at 1:45pm
आदरणीया राजेशजी बहुत खूब क्या ग़ज़ल कही है शानदार हर शेर खूब हुआ है दिली बधाइयाँ क़ुबूल करे
जद्दो जहद में जीस्त की हासिल हुए मुझे
उस पर हुजूर चाहते मैं पर समेट लू बहुत खूब हसिले ग़ज़ल शेर मुबारक बाद क़ुबूल करें आदरणीया । सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on October 25, 2015 at 1:15pm

राहिला जी ,आपको ग़ज़ल पसंद आई मेरा लिखना सार्थक हुआ दिल से आभार आपका |

Comment by Rahila on October 25, 2015 at 12:49pm
बहुत सुन्दर ग़ज़ल आदरणीया राजेश कुमारी जी । खासतौर पर ए तितलियो संभाल. ...आकर समेट लूं । दिल को छू गई ।

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