For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

सड़क के किनारे छाँव देता

एक दायरे के भीतर कैद

खुद घुटता हुआ मगर

हमें साँसें देता हुआ वृक्ष

कंक्रीट की घेराबंदी से

छोटी सी सीमा रेखा

में बंधा हुआ वह पेड़

और पिजड़े मैं कैद

मासूम और बेबस पक्षी

दोनों में कितना साम्य है

दोनों ही जीवित हैं

लेकिन स्वतन्त्रता को खोकर

दोनों की ही हदें

मानव ने बाँध दी हैं

और अब वे बस हमारी

आवश्यकता का साधन हैं

लेकिन वृक्ष पक्षी से

कहीं अधिक बेबस है

क्योंकि उसे चीत्कारने का भी

विकल्प प्राप्त नहीं है

उसे अपना जीवन

सींचने के लिए सीधे

पाताल तक धंसना है

और कोई विस्तार उसे

उपलब्ध ही नहीं है

और हम इतना आत्मकेंद्रित हैं

कि उसकी हरी भरी छांव

पाकर धन्य हुए जाते हैं

और कंक्रीट से कसी गयी

नकेल तक दृष्टि पहुँचती ही नहीं

मानव जो प्रकृति के लिए

मधुमक्खी से भी गौड़ है

खुद को सर्वेसर्वा मान बैठा है

हमारी सुविधाएं, हमारा विकास

कितना खोखला और स्वार्थी है

हम अकेले आगे बढ़ रहे हैं

बिना औरों को साथ लिए

और भूल जाते हैं कि अकेला

हमारा अस्तित्व संभव ही नहीं

कल यही ख़त्म होते वृक्ष

ये विलुप्त होते पक्षी

सब हमसे जवाब मांगेंगे

और हम कटघरे में

निरुत्तर और पछताते हुए

शर्म से सिर झुकाए खड़े   

प्रकृति द्वारा निश्चित 

विनाश का दंड भोग रहे होंगे I

.

(तनूजा उप्रेती )

मौलिक व अप्रकाशित

 

Views: 526

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Tanuja Upreti on November 6, 2015 at 4:16pm

आभार राहिला जी 

Comment by Rahila on November 5, 2015 at 4:24pm
बहुत बेहतरीन प्रस्तुति आदरणीया तनूजा जी । बहुत बधाई आपको इस सार्थक रचना के लिये ।
Comment by Tanuja Upreti on November 5, 2015 at 10:26am

आभार सतविंदर जी 

Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on November 4, 2015 at 11:13pm
उत्कृष्ट प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई आदरणीया
Comment by Tanuja Upreti on November 4, 2015 at 8:59pm

बहुत बहुत धन्यवाद आदरणीय  मिथिलेश जी ,आदरणीय आबिद जी,आदरणीय श्याम नारायण जी ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 4, 2015 at 7:53pm

आदरणीया तनूजा जी, पर्यावरण के प्रति सचेत करती और प्रकृति के निकट पहुंचाकर सोचने को विवश करती गहन वैचारिक प्रस्तुति हेतु हार्दिक बधाई निवेदित है. सादर 

Comment by Abid ali mansoori on November 4, 2015 at 7:42pm

सड़क के किनारे छाँव देता

एक दायरे के भीतर कैद

खुद घुटता हुआ मगर

हमें साँसें देता हुआ वृक्ष

कंक्रीट की घेराबंदी से

छोटी सी सीमा रेखा

में बंधा हुआ वह पेड़

और पिजड़े मैं कैद

मासूम और बेबस पक्षी

दोनों में कितना साम्य है

दोनों ही जीवित हैं

लेकिन स्वतन्त्रता को खोकर

दोनों की ही हदें

मानव ने बाँध दी हैं!

वहुत खूब, पूरी रचना वास्तविकता का रूप लिए है, जितनी तारीफ़ की जाए कम है, हार्दिक वधाई स्वीकारें आदरणीया तनुजा जी!

 

Comment by Shyam Narain Verma on November 4, 2015 at 5:13pm

इस शानदार प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई ! सादर 

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

आशीष यादव replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय श्री अशोक कुमार जी इस कजरी पर टिप्पणी के लिए आपको बहुत बहुत धन्यवाद।  आज के परिवेश…"
Monday
Ashok Kumar Raktale replied to आशीष यादव's discussion कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी) in the group भोजपुरी साहित्य
"आदरणीय आशीष यादव जी सादर, सावन की सुंदर और मधुर  फुहारों में यह कजरी की प्रस्तुति  बहुत…"
Monday
vijay nikore posted a blog post

सांकल मन के द्वार पर

सांकल मन के द्वार परजब-जब जहाँ कहीं फूल खिलेतुझे याद किया था हमने ... "क्या...तुम्हारे मन के द्वार…See More
Monday
आशीष यादव added a discussion to the group भोजपुरी साहित्य
Thumbnail

कइके हमके ब्लाॅक पिया ना ……..  (कजरी)

काहें सावन में देला अइसे शॉक पिया कइके हमके ब्लाॅक पिया ना …….. मनवा तोहके पुकारे नैना फोनवा…See More
Sunday
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

हरिगीतिका छंद

  हरि नाम लो हरि नाम लो हरि, नाम लो  हरि नाम लो।यह नाम  ही  है  सत्य  मानव,  भोर लो नित शाम…See More
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी जी सादर,  चौपाइयों की इस प्रस्तुति पर उत्साहवर्धन के लिए आपका हृदय से…"
Jul 24
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय सौरभ जी सादर प्रणाम, प्रस्तुत चौपाइयों की सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार. जी !…"
Jul 24
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक - - - - शोखी

दोहा पंचक. . . . . शोखीशोख उमर की शोखियाँ, चंचल दृग संकेत ।भीगा यौवन मद भरा, दिल को करे अचेत…See More
Jul 21

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आदरणीय अशोक भाईजी, वर्षा ऋतु, विशेषकर सावन मास, के नम क्षणों का रागात्मक वर्णन रोचक बन पड़ा है.…"
Jul 20
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Ashok Kumar Raktale's blog post चौपाइयाँ
"आ. भाई अशोक जी, सादर अभिवादन। पावस पर सुंदर चौपाइयों की रचना हुई है। हार्दिक बधाई।"
Jul 18
Ashok Kumar Raktale posted a blog post

चौपाइयाँ

दोहाबरखा के बढ़ते क़दम, आये  हैं  अब पास।दूर नहीं है साजना, सुरभित सावन मास।। चौपाईवह फुहार वह साथ…See More
Jul 14
Ashok Kumar Raktale commented on Ashok Kumar Raktale's blog post बरसात
"  आदरणीय चेतन प्रकाश साहब सादर नमस्कार, यही तो मुख्य है विषय है इस रचना का. नदी नहीं उफ़नाई है.…"
Jul 14

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service