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हर द्वारे हम दीप जलाएं, उत्सव की हो शाम सदा

झूम झूम कर खूब नाचता, जंगल में है मोर सदा |

 

क्षण भंगुर ये जीवन अपना,

कर्म करे से सधता सपना |

रोने से क्या कुछ मिल पाए ?

आओ सब मिले हाथ मिलाएं, काम बाँटते रहे सदा,

हर द्वारे हम दीप - - - - - - - -

 

आतंक का मिल करे सामना,

रहे न ह्रदय में हीन भावना |

सबके सुख के दीप जलाएं

सब मिल डर को दूर भगाएं, ह्रदय भरे विश्वास सदा 

हर द्वारे हम दीप - - - - - -- - -

 

जात पात का भेद मिटाएँ

रंग भेद अब दूर भगाएं |

प्रेम भाव बढ़ता ही जाएं

घर घर में उजियारा छाएँ, सभी रहे खुशहाल सदा

हर द्वारे हम दीप - - - - - - - -

 

भारत माँ की लाज बचाएं

विश्व गुरु फिर से कहलाएं

व्यभिचारी को सजा दिलाएं

सत्ता में सेवक को लाएं, बढे देश का मान सदा

हर द्वारे हम दीप -- - - - - - - 

 

(मौलिक व अप्रकाशित)

-लक्ष्मण रामानुज लडीवाला 

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Comment

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Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 24, 2015 at 11:31am

हार्दिक  आभार  आदरणीय श्री रर गिरिर्राज  भंडारी  जी 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 20, 2015 at 10:54am

जी आदरणीय, मनुष्य के पारिवारिक परिवेश और शिक्षा दीक्षा के अनुरूप ही स्वभाव, उसकी सोच, उसकी जीवन शैली, उसकी प्रकृति |

उसका साहित्य उसका आईना | तुकान्तता साधने का और प्रयास रहेगा  आदरणीय | आपका बहुत बहुत आभार श्री सौरभ भाई जी 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 20, 2015 at 7:56am

आदरणीय लक्ष्मण भाई , खूब सुन्दर भाव पूर्न गीत रचना हुई है , आपको दिली बधाइयाँ । बाक़ी बातें , आ. सौरभ भाई कह ही चुके है । ध्यान दीजियेगा ।


सदस्य टीम प्रबंधन
Comment by Saurabh Pandey on November 19, 2015 at 10:48pm

आपकी संवेदना का प्रतिफल यह गीत है, आदरणीय !  मैं संभवतः इस मंच पर आपका कोई पहला गीत देख रह हूँ.  आपके प्रयास पर हृदय से बधाइयाँ !

वैसे, प्रस्तुत गीत की तुकान्तता पर तनिक और संयत होना होगा. मैं आदरणीय मिथिलेशजी की बातों से सहमत हूँ. 

शुभेच्छाएँ 

Comment by लक्ष्मण रामानुज लडीवाला on November 18, 2015 at 3:42pm

हार्दिक आबार श्री मिथिलेश वामनकर जी | संशोधन का प्रयास किया, कृपया पुनः अवलोकन करे | सादर 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on November 17, 2015 at 4:40pm

आदरणीय लक्ष्मण सर बहुत सुन्दर गीत हुआ है इस प्रस्तुति पर हार्दिक बधाई 

एक निवेदन- प्रस्तुति में तुकान्ता का निर्वहन भी हो गया होता तो प्रस्तुति का सौन्दर्य बढ़ जाता. सादर 

कृपया ध्यान दे...

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