For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

2122   1122   1122   22

किसको कितना है मिला माल,न हमसे पूछो।

हाँ!  करप्शन  का  ये  जंजाल न  हमसे पूछो।

तेरे  कारण  हुई  है, ये  जो  मेरी  हालत  है,

अब  तुम्हीं  आके  मेरा  हाल  न  हमसे  पूछो।

ज़ेह्न-ओ-दिल से तेरी यादों को मिटा डाला,अब

बीते  दिन, गुज़रे  हुए  साल  न  हमसे  पूछो।

कौन आख़िर ले गया गाँव की पंचायत को,

कहाँ  ग़ायब  हुए  चौपाल, न  हमसे  पूछो।

जनवरी और दिसंबर के महीने में "जय",

सूर्य  तोड़ेगा  कब  हड़ताल  न  हमसे  पूछो।

=============================

(मौलिक व अप्रकाशित)

Views: 1015

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 6, 2015 at 10:49am

क्या बात है , आ. लक्षम्ण भाई , आपका आगे आकर कठिनाई का हल बताना बहुत अच्छा लगा , शुक्रिया आपका ।

आ. जयनित भाई , आपका प्रयास भी सही है , चाहे जिसे रखें ।

आप ही ने तो बनाई ये हमारी हालत,
इस तरह बे हया हो हाल न हमसे पूछो  --एक  सुधार ऐसे भी कर सकते हैं

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 6, 2015 at 9:39am
सुझाव के लिए बहुत-बहुत धन्यवाद,आदरणीय लक्षमण जी..

आपके शेर से प्रेरित इस शेर के बारे में क्या विचार है आपका?

"आप ही ने तो बनाई ये हमारी हालत,
इस तरह आप ही अब हाल न हमसे पूछो.."
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on December 6, 2015 at 8:55am

आ० भाई जयनितजा बहुत सुन्दर ग़ज़ल हुई है . आ० भाई गिरिराज जी के सुझाव पर गौर करते हुए एक संभावित हल सुझा रहा हूँ अन्यथा न लें.यह  दोष  एक ही संज्ञा के लिए अलग अलग सर्वनाम का प्रयोग होने पर होता है ...

आप  ही से तो  हुई  है ये  हमारी   हालत

इस तरह  आ के  नया   हाल  न  हमसे  पूछो।....

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 5, 2015 at 8:52pm
ग़ज़ल की सराहना के लिए हार्दिक आभार आपका, आदरणीय गिरिराज भंडारी जी।

मुझे तो इस दोष के बारे में बिलकुल ज्ञान ही नहीं है। रदीफ़ "न हमसे पूछो" है, तो फिर शेर में मुझसे कैसे लिखा जाय?? कृपया आप ही कोई हल बताएं!!सादर।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on December 5, 2015 at 8:44pm

आदरणीय अच्छी गज़ल कही है , दिली बधाइयाँ स्वीकार करें

इस शे र मे ऐबे  शुतुरगुरबा है , देख लीजियेगा  --

उला मे  तेरे और मेरी  के साथ सानी में  तू  और मुझसे लेना चाहिये था ।

तेरे  कारण  हुई  है, ये  जो  मेरी  हालत  है,

अब  तुम्हीं  आके  मेरा  हाल  न  हमसे  पूछो।

Comment by जयनित कुमार मेहता on December 5, 2015 at 6:03pm
ग़ज़ल की सराहना के लिए आपका बहुत-बहुत आभार।।
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 5, 2015 at 10:46am
मज़ा आ गया। दिल मांगे और !!! बहुत बहुत हार्दिक बधाई आपको आदरणीय जयनित कुमार मेहता जी।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna commented on लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर''s blog post दोहे -रिश्ता
"आदरणीय लक्ष्मण धामी जी रिश्तों पर आधारित आपकी दोहावली बहुत सुंदर और सार्थक बन पड़ी है ।हार्दिक बधाई…"
Tuesday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"तू ही वो वज़ह है (लघुकथा): "हैलो, अस्सलामुअलैकुम। ई़द मुबारक़। कैसी रही ई़द?" बड़े ने…"
Monday
Sheikh Shahzad Usmani replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"गोष्ठी का आग़ाज़ बेहतरीन मार्मिक लघुकथा से करने हेतु हार्दिक बधाई आदरणीय मनन कुमार सिंह…"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आपका हार्दिक आभार भाई लक्ष्मण धामी जी।"
Monday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"आ. भाई मनन जी, सादर अभिवादन। बहुत सुंदर लघुकथा हुई है। हार्दिक बधाई।"
Monday
Manan Kumar singh replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"ध्वनि लोग उसे  पूजते।चढ़ावे लाते।वह बस आशीष देता।चढ़ावे स्पर्श कर  इशारे करता।जींस,असबाब…"
Sunday
Admin replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-120
"स्वागतम"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. रिचा जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अजय जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई चेतन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमीरुद्दीन जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए आभार।"
Saturday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-177
"आ. भाई अमित जी, सादर अभिवादन। गजल की प्रशंसा के लिए धन्यवाद।"
Saturday

© 2025   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service