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ऐसे तो उसे इस घर में आये एक हफ्ता होने को आ रहा था किन्तु अभी भी वह एक अवांछित ही थी घर वालों के लिए I कसूर बस इतना था कि उसने इस घर के इकलौते बेटे के साथ प्रेम विवाह किया था I सिर्फ विवाह ही नहीं अलग रहने के बजाय वक़्त के साथ सब कुछ ठीक हो जाने की आस लिए वह इस घर में भी आ गयी थी I नतीजा !! अवांछित ......I पर वह भी थी एकदम जीवट किस्म की !ठान लिया था कि जब तक सब ठीक न हो जाएगा हार नहीं मानेगी I
उस दिन वह पानी पीने के लिए किचन की ओर जा रही थी कि माँजी के कमरे से आते स्वर को सुन उसके कदम खुद बखुद ठिठक गए I
' कुछ दिन तो और रुक जाती ! मैं क्या करुँगी तुम्हारे बिना ,काटने को आएगा अब ये घर I '
ओह! लगता है ,आज दीदी भी जा रही हैं I सोचा उसने I
'माँ ,तुम चिंता न करो !देखना धीरे धीरे सब ठीक हो जाएगा !अब भूल जाओ सब पुरानी बातें और एक नयी शुरुवात करो I आखिर कही न कही तो ब्याह होता ही न !!तो अपनी पसंद से ही सही I '
आज पहली बार ननद उसके पक्ष में बोली थी I उसकी हिम्मत थोड़ी बढ़ी थी I
'अब क्या ठीक ,और बे ठीक !जब बेटा ही अपना नहीं रहा तो किससे और कैसी उम्मीद !! 'और वह जोर से मुह खोल कर रो पड़ी थीं I
'माँ चुप हो जाओ न ! '
रुलाई के इस स्वर ने बहार कड़ी सौम्य को भीतर तक उद्वेलित कर दिया था I जहाँ हसी ख़ुशी का माहौल होना था घर और रिश्तो में भी सन्नाटा पसरा हुआ था I वो तो ऊपरी मन से रिसेप्शन रख दिया गया था ताकि जग हँसाई न हो I कितनी अजीब बात थीं न !बेटे कि भावनाओ की जगह जग की चिंता !! '
तभी एक और स्वर ने उसकी तन्द्रा भंग की I
'सुभाष की माँ ,अब जाने भी दो सबको ट्रेन छूट जाएगी I अब जो भाग्य में है वही होगा न '
अब उससे बाहर न रुका गया I सोचा उसने कभी न कभी किसी न किसी को पहल करनी ही होगी तो उम्र और रिश्ते के लिहाज से वही क्यों न करे I और वह भीतर चली गयी I उसे यूँ अचानक आया देख कर सब असहज हो उठे I
'आओ सौम्या,कुछ चाहिए ? 'ननद की आवाज़ थीं I
' जी माफ़ कीजिये बिना अनुमति भीतर आ गयी I कुछ पल रुक कर - 'मैं आप सबसे यह कहना \ चाहती हूँ कि जो हुआ सो हुआ ! अब मैं आपके एक परिवार का अभिन्न हिस्सा बन कर रहना चाहती हूँ I सब आश्चर्य से उसे देख रहे थे ,कितनी निर्भीकता से वह अपनी बात कह रही थीं I वह अब अपनी सास की तरफ मुखातिब हुई - 'माँ जी ,मैं ये तो नहीं कहती कि मैं आपकी बेटी बन के रहूंगी ,क्योकि मैं जानती हूँ कोई किसी कि जगह नहीं ले सकता !हां इतना भरोसा जरूर दिलाना चाहती हूँ कि एक अच्छी बहू बनने की कोशिश करुँगी !! प्लीज आप रोइए नहीं कह कर वह आगे बढ़ी और उनके गले लग गयी I कोई भी इस अप्रत्याशित के लिए तैयार नहीं था ,स्वयं दुर्गा देवी भी नहीं किन्तु वे इस प्रेम से परिपूर्ण अंकपाश का अधिक देर तक प्रतिरोध न कर पायी I उन्होंने बारी बारी से सबकी आँखों में झाँका I सबकी आँखों में आंसू और होठो पर मुस्कान थिरकती दिखी I पता नहीं कब बेटा भी दरवाजे पर आ खड़ा हुआ था I उसकी आँखों में भी स्पष्ट मनुहार था ' मान जाओ न माँ !! '
ये देख उनके मन का आसमान भी धीरे धीरे आँखों के रास्ते पिघलने लगा ,उनके हाथ बहू के सर की ओर बढ़ गए थे आर्शीवाद की मुद्रा में I
मन ही मन सोचरही थीं किस्मत से बहू तो संस्कारी और सुशील मिली हैं I
मौलिक व् अप्रकाशित
मीना पाण्डेय

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Comment by meena pandey on December 11, 2015 at 1:10am

आगे से मैं आपकी बात का अवश्य संज्ञान लुंगी आदरणीय गोपाल नारायण श्रीवास्तव जी मार्गदर्शन के लिए हार्दिक आभार

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 7, 2015 at 8:12pm

 ' थोडा  यथार्थ होती तो अधिक् प्रभावकारी  होती

Comment by meena pandey on December 7, 2015 at 1:13am

प्रोत्साहन  के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय Shubharanshu pandey  जी 

Comment by meena pandey on December 7, 2015 at 1:11am

कथा पर आपकी उपस्थिति और हौसलाअफजाई के लिए हार्दिक धन्यवाद आदरणीय Dr विजय shankar  जी 

Comment by meena pandey on December 7, 2015 at 1:07am

प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय mohan Begowal  जी 

Comment by meena pandey on December 7, 2015 at 1:05am

प्रोत्साहन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय Sheikh Shehzad usmani जी 

Comment by Dr. Vijai Shanker on December 7, 2015 at 12:21am
कहानी अच्छी है , सराहनीय , बधाई , आदरणीय मीना , सादर।
Comment by Shubhranshu Pandey on December 6, 2015 at 11:18pm

आदरणीय मीना जी, 

सुन्दर भाव के साथ कही गयी कथा. शिल्प पर गुनीजन अपने विचार अवश्य देंगे...

सादर.

Comment by मोहन बेगोवाल on December 6, 2015 at 10:06pm

  समाज जिस दौर सी गुजर रहा है , कुछ समाजों में ऐसे विवाह सहज ही हो रहे , माँ बाप की  तरफ से भी विरोध कम हो रहा , इसी तरह की बात करती इस लघुकथा के लिए बधाई हो 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on December 6, 2015 at 12:10pm
" मन ही मन सोचरही थीं किस्मत से बहू तो संस्कारी और सुशील मिली हैं "
--बहुत बढ़िया समपन्न हुई है लघुकथा। आपकी उत्कृष्ट लेखनी को पुनः प्रमाणित करती हुई भावपूर्ण संकल्प पूर्ण रचना के लिए हृदयतल से बहुत बहुत बधाई और शुभकामनाएँ आपको आदरणीया मीना पाण्डेय जी।
"

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