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ग़ज़ल-नूर - माँगते इंसाफ़ किस से बिस्मिलों के वास्ते

२१२२/२१२२/२१२२/२१२ 

माँगते इंसाफ़ किस से बिस्मिलों के वास्ते
अदलिया थी दिल बिछाए क़ातिलों के वास्ते.
.
रास्ते आपस में उलझे, मंजिलें पिन्हा हुईं,     
रास्ते गरचे बने थे मंज़िलों के वास्ते.
.
साहिलों पर कश्तियाँ महफूज़ रहती हैं मगर
कश्तियाँ कब थी बनाईं साहिलों के वास्ते.
.
इक निगाहे-शोख से हम ने लड़ाई थी नज़र
चंद क़िस्से छोड़ आए महफ़िलों के वास्ते.
.
कुछ तेरा ग़म और कुछ अग्यार की तंज़-ओ-निगाह  
और भी आसाँ हुए हम मुश्किलों के वास्ते.
.
हम पुराने लोग हैं ख़ुद में अधूरापन लिए
छोड़ जाएँगे ये दुनिया कामिलों के वास्ते. 
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 705

Comment

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Comment by जयनित कुमार मेहता on January 17, 2016 at 10:54am
बहुत सुन्दर ग़ज़ल, आदरणीय..
Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 14, 2016 at 9:27am

शुक्रिया आ. शेख साहिब 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 14, 2016 at 9:27am

शुक्रिया आ. रवि जी 

Comment by Sheikh Shahzad Usmani on January 13, 2016 at 2:54pm
वाााह जनाब...
//साहिलों पर कश्तियाँ महफूज़ रहती हैं मगर
कश्तियाँ कब थी बनाईं साहिलों के वास्ते.//
// हम पुराने लोग हैं ख़ुद में अधूरापन लिए
छोड़ जाएँगे ये दुनिया कामिलों के वास्ते. //... बेहतरीन भावाव्यक्ति... बहुत बहुत बधाई आपको आदरणीय निलेश शेव्गांवकर 'नूर' साहब!
Comment by Ravi Shukla on January 13, 2016 at 2:31pm

वाह वाह क्‍या खूब ग़ज़ल कही है आपने आदरणीय नीलेश जी पढ़कर मजा आ गया । सभी शेर कमाल है बधाई स्‍वीकार करें ।

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 13, 2016 at 8:47am

शुक्रिया आ. महर्षि जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 13, 2016 at 8:47am

शुक्रिया आ. गिरिराज जी 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on January 13, 2016 at 8:46am

शुक्रिया आ. समर कबीर साहब 

Comment by maharshi tripathi on January 12, 2016 at 7:20pm
बहुत सुंदर गज़ल है,बधाई आपको आ नीलेश जी !!!
Comment by maharshi tripathi on January 12, 2016 at 7:19pm
बहुत सुंदर गज़ल है,बधाई आपको आ नीलेश जी !!!

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