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1222    1222    1222    1222
न जाने  हाथ में  किसके है ये पतवार  मौसम की
बदल पाया  न  कोई भी  कभी  रफ्तार मौसम की /1

सितम इस पार मौसम का दया उस पार मौसम की
समझ  चालें  न  आएँगी कभी  अय्यार मौसम की /2

अभी है पक्ष  में तो  मत  करो  मनमानियाँ इतनी
न जाने कब  बदल जाए  तबीयत यार मौसम की /3

उजाड़े  जा  रहा क्यों तू  धरा   से  रोज ही इनको
दवाई  पेड़  पौधे  हैं  समझ   बीमार  मौसम की /4

न आए  हाथ उतने  भी   लगाए  बीज थे जितने
पड़ी कुछ दोस्तो  ऐसी फसल पर मार मौसम की /5

पहुँच कितनी भी बढ़ जाए भले ही चाँद मंगल तक
गुलामी  ही करेगा  पर  सदा  सन्सार  मौसम की /6

बहुत सपने  हैं आशा में  जवाँ  इस बार वो होंगे
लिखी हो यार रूसवाई न अब के बार मौसम की /7
****************
मौलिक व अप्रकाशित
लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’

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Comment

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Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:05pm

आ0 भाई जयनित जी , गजल की प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:05pm

आ0 भाई सुशील जी, इस उत्साहवर्धक प्रतिक्रिया के लिए हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:04pm

आ0 भाई मदन मोहन जी , उपस्थिति और प्रशंसा के लिए आभार ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:04pm

आ0 भाई नादिर खान जी हार्दिक धन्यवाद ।

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 3, 2016 at 12:04pm

आ0 भाई मोहित मिश्रा जी, अपार स्नेह के लिए आभार ।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 28, 2016 at 10:22am

आदरणीय लक्ष्मण जी, बेहद खूबसूरत ग़ज़ल निकाली आपने। दिली मुबारकबाद क़ुबूल करें।।

Comment by Sushil Sarna on February 25, 2016 at 8:04pm

अभी है पक्ष में तो मत करो मनमानियाँ इतनी
न जाने कब बदल जाए तबीयत यार मौसम की /3
.... वाह बहुत खूब आदरणीय ... अहसासों की ख़ूबसूरती से लबरेज़ इस ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई सर।

Comment by Madan Mohan saxena on February 25, 2016 at 3:07pm

सितम इस पार मौसम का दया उस पार मौसम की
समझ चालें न आएँगी कभी अय्यार मौसम की /2

अभी है पक्ष में तो मत करो मनमानियाँ इतनी
न जाने कब बदल जाए तबीयत यार मौसम की

खूबसूरत

Comment by नादिर ख़ान on February 25, 2016 at 11:21am

सितम इस पार मौसम का दया उस पार मौसम की
समझ  चालें  न  आएँगी कभी  अय्यार मौसम की 

अभी है पक्ष  में तो  मत  करो  मनमानियाँ इतनी 
न जाने कब  बदल जाए  तबीयत यार मौसम की 

बहुत खूबसूरत ग़ज़ल कही आदरणीय लक्ष्मण  जी ढेरों मुबारकबाद आपको ......

Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on February 25, 2016 at 11:16am

आ० कांता बहन प्रशंसा के लिए हार्दिक आभार .

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