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ग़ज़ल - जब किसी लब पे कोई दुआ ही नहीं -- गिरिराज भंडारी

212   212   212   212 

जीत उसको मिली जो लड़ा ही नहीं

कौन सच में लड़ा ये पता ही नही

 

साजिशों से अँधेरा किया इस क़दर  

कब्र उसकी बनी जो मरा ही नहीं

 

झूठ के पाँव पर मुद्दआ था खड़ा

पर्त प्याज़ी हठी, कुछ मिला ही नहीं

 

यूँ बदी अपना खेमा बदलती रही

अब किसी के लिये कुछ बुरा ही नहीं

 

इन ख़ुदाओं को देखा तो ऐसा लगा

इस जहाँ में कहीं अब ख़ुदा ही नहीं

 

छोड़ दी जब गली, नक्श भी मिट गये

चाहतें क्या रहें ? जब गिला ही नहीं 

 

क्या कुबूल अब ख़ुदा भी करे सोचिये

जब किसी लब पे कोई दुआ ही नहीं

 

जिसने समझा मुझे उसने देखा मुझे  

मुझको खोजो नहीं, मै छिपा ही नहीं

************************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment by सुनील प्रसाद(शाहाबादी) on March 20, 2016 at 12:56pm
बहुत खूब जनाब (मेरे ख़याल से साजिशों ने अँधेरा )ज्यादा माकूल लगता है।
Comment by narendrasinh chauhan on March 8, 2016 at 3:51pm

अच्छी रचना हेतु बधाई आदरणीय


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on March 6, 2016 at 11:42pm

आदरणीय गिरिराज सर, शानदार ग़ज़ल कही है आपने. शेर दर शेर दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं.

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 3, 2016 at 3:41pm

वाहह वाहह आदरणीय बहुत ही सुंदर


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2016 at 10:07pm

आदरणीय  प्रधान संपादक महोदय , मेरी इस गज़ल को फीचर करने के लिये आपका ह्र्दय से आभार ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on March 1, 2016 at 10:04pm

आदरनीय जयनित भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by जयनित कुमार मेहता on February 28, 2016 at 9:35am

आदरणीय गिरिराज भंडारी जी, खूबसूरत ग़ज़ल कही आपने। मतला तो लाजवाब हुआ है।

Comment by Rahul Dangi Panchal on February 28, 2016 at 6:59am
अच्छी रचना हेतु बधाई आदरणीय

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2016 at 10:58pm

आदरणीय गुमनाम भाई , आपका तहे दिल से शुक्रिया ॥


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on February 25, 2016 at 10:58pm

आदरणीय सुशील सरना भाई , आपकी मुखर सराहना के लिये दिल से शुक्रिया आपका ।

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