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ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

ग़ज़ल (मुहब्बत से किनारा कर रहा है )

------------------------------------------------

1222 --------1222 --------122

मुहब्बत से किनारा कर रहा है |

हमें वह बे सहारा  कर रहा है |

तुम्हारा देखना रह रह के मुझको

वफ़ा को आश्कारा  कर रहा है |

न कोई देख ले यह डर मुझे है

वो खिड़की से इशारा  कर रहा है |

युं ही क़ायम रहे यह दोस्ताना

कहाँ आलम गवारा  कर रहा है |

वो लाके ग़ैर को महफ़िल में मेरी

कलेजा पारा पारा  कर रहा है |

अचानक हिचकियाँ आती नहीं हैं

कोई चरचा हमारा कर रहा है |

कहीं रुस्वा न ऐ तस्दीक़ कर दे

तअर्रुफ़ जो तुम्हारा कर रहा है |

(मौलिक व अप्रकाशित )  

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Comment by Ravi Shukla on March 8, 2016 at 1:08pm

आदरणीय तस्दीक अहमद जी बहुत सुन्दर ग़ज़ल कही आपने हार्दिक बधाई स्वीकार करें ।  

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on March 7, 2016 at 9:59pm

वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2016 at 9:11pm

मोहतरम जनाब सुशील सरना  साहिब ,   आपकी हौसला अफ़ज़ाई का तहे दिल से शुक्रिया ,महरबानी 

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2016 at 9:01pm

जनाब  राहुल डांगी  साहिब ,हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया।

Comment by Sushil Sarna on March 7, 2016 at 9:01pm

अचानक हिचकियाँ आती नहीं हैं
कोई चरचा हमारा कर रहा है |
.... वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत अशआर कहे हैं आपने अपनी इस ग़ज़ल में। इस दिलकश प्रस्तुति के लिए दिल से बधाई स्वीकार करें।

Comment by Tasdiq Ahmed Khan on March 7, 2016 at 9:00pm

जनाब सतविंदर कुमार साहिब ,हौसला अफ़ज़ाई का बहुत बहुत शुक्रिया। ...... आपने दुरुस्त फ़रमाया ,  वह की ह को गिराया है

Comment by Rahul Dangi Panchal on March 7, 2016 at 7:01pm
बहुत सुन्दर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 7, 2016 at 4:00pm
जैसे -वो खिड़की,वो लाके गैर को महफ़िल में मेरी।सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 7, 2016 at 3:58pm
जनाब तस्दीक अहमद जी नमन।आपकी ये ग़ज़ल बहुत उम्दा हुई है।दिली मुबारकबाद।

कई अश आर में आपने मात्रा (वज़्न) गिराया है।मुझे ऐसा जान पड़ा।क्या ऐसा हुआ है या मैं उलझन में हूँ।कृपया मार्गदर्शन करें।सादर

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