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मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाती नहीं हो- ग़ज़ल

122 122 122 122

निगाहें भला क्यूँ मिलाते नहीं हो।
मनस पृष्ठ मुझको पढ़ाते नहीं हो।।

छिपाते हो तुम राज अपने जिया के।
बताओ मुझे क्यों बताते नहीं हो।।

हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की पर्तें।
भला नूर क्यूँ तुम दिखाते नहीं हो।।

सघन वेदना के जो घन हैं हृदय में।
भला फिर क्यूँ दरिया बहाते नहीं हो।।

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।

है 'पंकज'का नाता अगर नीर ही से।
तो नैनों में काहें खिलाते नहीं हो।।

.
मौलिक एवम् अप्रकाशित

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Comment by TEJ VEER SINGH on March 14, 2016 at 7:41pm

हार्दिक बधाई आदरणीय पंकज मिश्रा जी! बेहतरीन गज़ल!

मुझे तुमसे कोई शिकायत नहीं है।
सिवा इसके तुम मुस्कुराते नहीं हो।।

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 7:07pm
आदरणीय लक्ष्मण धामी सर सादर आभार
Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 7:07pm
आदरणीय समर कबीर सर, सादर प्रणाम। समुचित सुझाव के लिए सादर आभार। इसे जल्दी ही संशोधित करता हूँ।
Comment by Samar kabeer on March 14, 2016 at 6:37pm
जनाब पंकज कुमार मिश्रा जी आदाब,अच्ची ग़ज़ल कही आपने दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
तीसरे शैर का ऊला मिसरा इस तरह कर लें:-
"हैं चेहरे पे क्यों ये उदासी की परतें"
इसी तरह मक़्ते का ऊला मिसरा इस तरह करलें:-
"है'पंकज'का नाता अगर नीर ही से"
अगर आपको उचित लगे तो ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on March 14, 2016 at 11:23am

आ० पंकज भाई इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

Comment by Pankaj Kumar Mishra "Vatsyayan" on March 14, 2016 at 10:31am
आदरणीय नरेंद्र सिंह जी सादर धन्यवाद
Comment by narendrasinh chauhan on March 14, 2016 at 10:03am

खूब सुन्दर रचना

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