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खंजर या तलवार नहीं हूँ

मैं घातक हथियार नहीं हूँ

अपनी शर्तों पर जीती हूँ

क्यूँ कहते खुद्दार नहीं हूँ

मैं नदिया की शीतल धारा

जलता सा अंगार नहीं हूँ

ईश्वर की अनमोल कृति हूँ

औरत हूँ लाचार नहीं हूँ

उज्जवल रश्मि हूँ सूरज की

रातों का अंधियार नहीं हूँ

स्वाभिमान मुझे है प्यारा

मैं दुनिया में भार नहीं हूँ

मुझसे ही परिवार है रोशन

मैं उजड़ा  बाजार नहीं हूँ 

रमा वर्मा 

(मौलिक व अप्रकाशित )

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Comment by Sheikh Shahzad Usmani on March 20, 2016 at 5:09pm
सुस्वागतम अभिनंदन आदरणीया रमा वर्मा जी, आपकी बहुत सारी उत्कृष्ट रचनाएँ पढ़ता रहा हूँ। इस मंच पर ग़ज़ल कहने के इस शानदार प्रयास का स्वागत है। सम्मान्य सुधीजन के सुझावों पर ध्यान देने के बाद आपकी दूसरी बेहतरीन ग़ज़ल पढ़ने का अवसर मिला। सादर हार्दिक धन्यवाद।
Comment by Shyam Narain Verma on March 18, 2016 at 5:45pm
क्या बात है .... बहुत उम्दा | बधाई आप को 
Comment by Rama Verma on March 18, 2016 at 4:00pm

सभी साहित्य मनीषियों को मेरा सादर नमस्कार, सबसे पहले तो देर से उपस्थित होने के लिए आप सबसे क्षमा चाहती हूँ , आप सबकी अनमोल प्रतिक्रिया के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद , आपकी समीक्षा निश्चित ही मेरी लेखनी को सुदृढ़ बनाएगी , मंच पर सदस्य बनने  के बाद ये मेरी पहली पोस्ट है , मैं सुधार करने का प्रयास करुँगी | हार्दिक आभार संग नमन ...

Comment by Rahul Dangi Panchal on March 17, 2016 at 3:26pm
आदरणीय शुक्ला जी आपने सही कहा कुछ जगह बह्र खारिज है कुछ जगह तकाबुले रदीफ है और कई शे'र अपना अर्थ के लिए स्वतंत्र नहीं है आदरणीया रमा जी ने बेशक ग़ज़ल लिखने की कोशिश है परन्तु फिलहाल मुझे यह ग़ज़ल कम एक अच्छी कविता ज्यादा प्रतीत हुई बहुत कम मेहनत से आ. रमा जी इसे ग़ज़ल का सही रूप दे सकती है। ऐसा मैंनें इसलिए ही कहा था कि रमा जी ग़ज़ल को और अच्छी तरह समझने की कोशिश करे और मंच पर अब बार एक अच्छी ग़ज़ल रखे।

आदरणीय रमा जी इसे आप अन्यथा बिल्कुल न लेना ।
नमन!
Comment by Ravi Shukla on March 17, 2016 at 3:10pm

आदरणीय रमा जी बधाई इस गजल के लिये हमें तो इसका शिल्‍प गज़ल का ही लग रहा है बह्र है काफिया है एक विचार भी है इसमें फिर इसको गजल क्‍यो न कहा जाए । ये ठीक है कि इसमें कुछ स्‍थानों पर बह्र खारिज हो रही है । दूसरे और चौथे शेर में ताकबुले रदीफेन का दोष भी है ।

है स्‍वाभिमान मुझको प्‍यारा

मैं दुनिया में भार नहीं हूँ  ऐसे कर के इस के उला को बह्र में किया जा सकता है

आदरणीय राहुल जी आप इसमें गजल के किन तत्‍वों की कमी मानते है अवश्‍य साझा करें । जानकारी बढ़ेगी । सादर

Comment by रामबली गुप्ता on March 17, 2016 at 1:24pm
ग़ज़ल के शिल्प कई जगह भंग हैं किन्तु रचना भावपूर्ण है।बधाई स्वीकार करें। सादर
Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 16, 2016 at 7:49pm

आ० डांगी भाई जी, बेशक गज़ल बढ़िया है, दाद कुबूल करे....किंतु.....

//

ईश्वर की अनमोल कृति हूँ

औरत हूँ लाचार नहीं हूँ//  के उला में बह्र पुन: देख ले.  सादर

Comment by Samar kabeer on March 16, 2016 at 6:15pm
मोहतरमा रमा वर्मा जी आदाब,पहली बार आपकी ग़ज़ल से रूबरू हुआ हूं, इस बढ़िया ग़ज़ल के लिये दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएँ ।
Comment by Rahul Dangi Panchal on March 16, 2016 at 12:55pm
इस मंच पर ग़ज़ल के विषय में बहुत सी जानकारी उपलब्ध है
Comment by Rahul Dangi Panchal on March 16, 2016 at 12:54pm
आदरणीया रमा वर्मा जी बहुत ही सुन्दर रचना है परन्तु यह ग़ज़ल नहीं हो सकती इसे आप एक कविता कह सकते है।

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