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अतुकांत कविता : खेती (गणेश जी बागी)

ऊँची, नीची, मैदानी, पठारी, 

उथली, गहरी...

दूर तक विस्तृत

उपजाऊ जमीन.

 

यहाँ नहीं उपजते

गेहूँ, धान

फल, फूल,

न उगायी जाती हैं साग, सब्जियाँ

किन्तु,

जो उपजता हैं

उससे....

करोड़ों कमाती हैं

बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ

 

तय होतें हैं

सियासी समीकरण

 

बनती बिगड़ती हैं

सरकारें

 

पैदा होता है

विकास

आते हैं

अच्छे दिन.

 

हम जैसे तो बस

डालते रहते हैं उसमें

खाद और पानी

परिणाम स्वरूप  

लह-लहाती रहती है 

झूठ की खेती.

(मौलिक व अप्रकाशित)
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Comment

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Comment by DK Sharma on March 22, 2016 at 8:47am

वाह वाह बागी साहब 

बहुत खूब, अपनी बगावत ज़ारी रखिये.

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on March 21, 2016 at 12:22pm
किन्तु,
जो उपजता हैं
उससे....

करोड़ों कमाती हैं
बड़ी-बड़ी कम्पनियाँ

तय होतें हैं
सियासी समीकरण

बनती बिगड़ती हैं
सरकारें------------bahut sundar aadarneey
Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on March 20, 2016 at 10:11pm
आदरणीय बागी जी इस कविता के लिए दिली दाद कुबूल करें।

मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2016 at 10:04pm

आदरणीय सौरभ भईया, आपकी प्रतिक्रिया से मन मुग्ध है, बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2016 at 10:03pm

सराहना हेतु आभार आदरणीया कल्पना भट्ट जी.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2016 at 10:01pm

आदरणीय राम आश्रय जी, कविता पर आपकी उत्साहवर्धन करती प्रतिक्रिया हेतु बहुत बहुत आभार.


मुख्य प्रबंधक
Comment by Er. Ganesh Jee "Bagi" on March 20, 2016 at 9:59pm

आदरणीया राजेश जी, आपकी प्रथम सराहनायुक्त टिप्पणी इस कविता को सम्मानित कर गयी, बहुत बहुत आभार आदरणीया.

Comment by केवल प्रसाद 'सत्यम' on March 20, 2016 at 7:56pm

आ० बागी सर जी,    सादर प्रणाम!    सारगर्भित रचना के हृदयतल से हार्दिक बधाई स्वीकारें. सादर

Comment by Manisha Saxena on March 20, 2016 at 6:48pm

सुन्दर कविता | सुरेन्द्र वर्मा |

Comment by Samar kabeer on March 20, 2016 at 5:57pm
जनाब गणेश जी बाग़ी जी आदाब,वाह बहुत ख़ूब आपकी सोच की गहराई बयान करती इस बेहतरीन अतुकांत कविता के लिये दिल से बधाई स्वीकार करें ।

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