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जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं (ग़ज़ल)

बह्र : 1212 1122 1212 22

 

जहाँ में पाप जो पर्वत समान करते हैं

वो मंदिरों में सदा गुप्तदान करते हैं

 

लहू व अश्क़, पसीने को धान करते हैं

हमारे वास्ते क्या क्या किसान करते हैं

 

कभी मिली ही नहीं उन को मुहब्बत सच्ची

जो अपने हुस्न पे ज़्यादा गुमान करते हैं

 

गरीब अमीर को देखे तो देवता समझे

यही है काम जो पुष्पक विमान करते हैं

 

जो मंदिरों में दिया काम आ सका किसके?

नमन उन्हें जो सदा रक्तदान करते हैं

-------------

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

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Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:41pm

शुक्रिया आदरणीय सतविन्द्र जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:41pm

बहुत बहुत शुक्रिया आदरणीय समर साहब

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:41pm

शुक्रिया आदरणीय लक्ष्मण जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:40pm

शुक्रिया आदरणीय सुशील जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:40pm

शुक्रिया आदरणीय सुरेश जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:39pm

शुक्रिया आदरणीय नरेन्द्र सिंह जी

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on April 19, 2016 at 5:38pm
शुक्रिया आदरणीय दिनेश जी
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on April 19, 2016 at 9:28am
खूबसूरत मतले,लाज़वाब अशआर!दिली मुबारकबाद आदरणीय !
Comment by Samar kabeer on April 18, 2016 at 11:20pm
जनाब धर्मेन्द्र कुमार सिंह जी,आदाब,बहुत ही उम्दा ग़ज़ल कही है आपने,आपकी ग़ज़ल में एक ख़ूबी यह होती है कि उस में नये नये इस्तआरे देखने को मिलते हैं,इस ग़ज़ल में भी यह ख़ूबी मौजूद है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाऐं ।
Comment by लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' on April 18, 2016 at 11:21am

आ0 भाई धर्मेन्द्र जी इस सामाजिक संदेश देती  ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई l

कृपया ध्यान दे...

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