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विस्मित वो बिंदा थी / कविता

तुफानों से लड़ कर ,चूर - चूर हो जिंदा थी

बेकल ,चंचल, निर्जन ,निष्प्राण वो बिंदा थी

किसके लिये अखिल व्योम से मोती चुराये

आई थी मधु छाया आस मधुमास लिये

लहरों पर चलने वाली अहम से हारी थी

साहिल की निठुरता बेबस से टकराई थी

अंतर्मन में सुलगती , भटकती भ्रान्त- सी

औचित्यहीन कामनायें ज्वलित कान्त - सी

हरियाली छाहों तले स्पंदित वो जिंदा थी

इतराई सागर पर बौराई विस्मित वो बिंदा थी

मौलिक और अप्रकाशित

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Comment by pratibha pande on May 26, 2016 at 7:42pm

 सुन्दर भाव पूर्ण रचना ,  एक अलग अंदाज़ में ,,  हार्दिक बधाई प्रेषित  है  आदरणीया कांता जी 

Comment by बशर भारतीय on May 26, 2016 at 10:42am
सुंदर प्रवाहमयी रचना है आदरणीया कांता रॉय जी बहुत बहुत बधाई इस रचना के भाव भी बहुत अच्छे हैं
Comment by Ashok Kumar Raktale on May 25, 2016 at 8:38pm

आदरणीया कान्ता रॉय जी द्विपदीयों में रची गयी सुंदर भावपूर्ण रचना. बहुत-बहुत बधाई. सादर.

Comment by Samar kabeer on May 25, 2016 at 2:49pm
मोहतरमा कांता रॉय जी आदाब,बहुत सुंदर कविता लिखी इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।
पहली पंक्ति का पहला शब्द तुफान-'तूफान'
Comment by Sushil Sarna on May 25, 2016 at 2:07pm

आदरणीया कांता रॉय जी नारी संघर्ष को केंद्रित कर सृजित की गयी इस सुंदर शब्द चयन एवं निर्बाध प्रवाह की प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on May 25, 2016 at 9:03am
बहुत ही सुन्दर आदरणीया कान्ता राॅय जी शब्द चयन काबिल ए तारीफ है बधाई स्वीकार करें

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