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एक गुंचा ...
(२१२ x ३ )
क्यूँ हवा में ज़हर हो गया
हर शजर बेसमर हो गया !!१ !!


एक लम्हा राह में था खड़ा
याद में वो खंडर हो गया !!२!!


भर गया ज़ख्म कैसे भला
किस दुआ का असर हो गया !!३!!


आँख से जो गिरा टूट कर
दर्द वो एक सागर हो गया !!४!!


गुमशुदा था शहर आज तक
जल के वो इक खबर हो गया !!५!!


एक गुंचा क्या खिला बाग़ में
ख्वाब का वो एक घर हो गया !!६!!

सुशील सरना
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on June 13, 2016 at 2:26pm

आ.  बृजेश कुमार 'ब्रज'   जी ग़ज़ल  पर आपकी मधुर प्रशंसा का हार्दिक आभार। 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on June 12, 2016 at 5:19pm

बहुत ही खूबसूरत आदरणीय 

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