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ग़ज़ल: अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं

अंदाज कातिलों के बेहतरीन बहुत हैं ।
कुछ शख्स इस शहर में नामचीन बहुत हैं ।।

वो खैर मांगते रहे बुरहान की सदा।
उसकी दुआ में पेश हाज़रीन बहुत हैं ।।

आज़ाद मीडिया है अदावत का तर्जुमा ।
गुमराह हर खबर पे नाज़रीन बहुत हैं ।।

जब भी जला वतन तो जश्ने रात आ गयी ।
दैरो हरम के पास मजहबीन बहुत हैं ।।

मिटते हैं वही मुल्क बड़े जोर- शोर से ।
बैठे जहाँ घरों में फिदाईन बहुत हैं ।।

मेरी बलूच आसुओं पे जब नज़र गई ।
वो हुक्मरान देखिए गमगीन बहुत हैं ।।

अब हाल आस्तीन का न पूछिए जनाब ।
जिन्दा तमाम सांप क़ाईदीन बहुत हैं ।।

- नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित ग़ज़ल

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Comment by rajesh kumari on September 12, 2016 at 10:25pm

वाह्ह  बहुत  अच्छी ग़ज़ल कही  है आद० नवीन मणि जी बहुत बहुत बधाई 

Comment by Ashok Kumar Raktale on August 22, 2016 at 10:11pm

वाह ! बहुत खूबसूरत गजल कही है आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी. बहुत-बहुत मुबारकबाद क़ुबूल करें. सादर.

Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 21, 2016 at 10:52pm
सूंदर रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on August 18, 2016 at 10:07pm

खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाई

Comment by Naveen Mani Tripathi on August 18, 2016 at 6:10pm
क़ाइदीन शब्द कायदा से बना है । जो कायदा को बनाते हैं या सत्ताधारी या रूलर से है ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 18, 2016 at 3:43pm

बेहतरीन नवीन भाई . क़ाईदीन का अर्थ भी बताएं . सादर .

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