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स्वाभिमानी पत्थर-रामबली गुप्ता

मानव उवाच(कुकुभ छंद)

सुनो कथा पत्थर की भैया,
पत्थर क्या-क्या सहते हैं?
कथा व्यथा है इनकी सच मे,
डरे-डरे-से रहते हैं।।
जिसका भी जी चाहे इनको,
दीवारों में चुनवा दे ।
और हथौड़े की चोटों से,
टुकड़ों मे भी तुड़वा दे।।

पत्थर उवाच(ताटंक छंद)

चोटों की परवाह नही है,
चोटों पर दिल वारा है।
मानवता के काम आ सकें,
ये सौभाग्य हमारा है।।
महल-अटारी-मंदिर-मस्जिद,
नगर-डगर गुरुद्वारा है।
जग में गिरि से लघु कंकड़ तक,
हमसे निर्मित सारा है।।

सूर्य-चंद्र-ग्रह-उपग्रह-तारे,
सब मे अंश हमारा है।
हम ही मणि-मोती हीरा भी,
जो तुझको अति प्यारा है।।
तरु-नर-पशु-खग के जीवन को,
हमसे मिला सहारा है।
चीर हमारा वक्ष धरा पर,
निकली मृदु-जल-धारा है ।।

हे! नर! जग में परहितकारी,
चोटों से कब हारा है?
जन-हित हेतु समर्पित उसका,
होता तन-मन सारा है।।
कटें छटें या तोड़े जाएं,
हमने सब स्वीकारा है।
हर युग में निर्माण नया हो,
ये संकल्प हमारा है।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by रामबली गुप्ता on August 24, 2016 at 5:32pm
छंद पर प्रतिक्रिया के लिए और प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार आद0 अशोक रक्ताले जी
Comment by Ashok Kumar Raktale on August 21, 2016 at 10:33pm

वाह ! वाह ! दोनों ही छंद सुंदर रचे हैं आदरणीय रामबली गुप्ता जी. बहुत-बहुत बधाई. सादर.

Comment by रामबली गुप्ता on August 19, 2016 at 6:44am
हृदयतल से आभार आद0 गोपाल नारायन जी। यदि रचना में कोई कमी या सुधार की गुंजाइश दिखे तो अवश्य अपने बहुमूल्य सुझाव से हमे अनुगृहीत करियेगा। मुझे खुशी होगी और सीखने को तो मिलेगा ही साथ ही रचना को परिष्कृत होकर और भी निखरने का अवसर प्राप्त होगा। पुनश्च आभार।सादर
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 18, 2016 at 3:40pm

बढ़िया रचना है आदरणीय .

कृपया ध्यान दे...

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