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कविता-बन के शुचि स्नेह-सरोज.... रामबली गुप्ता

मत्त सवैया छंद

बन के शुचि स्नेह-सरोज सदा,
सबके उर-सर में विकसित हो।

मद-लोभ व द्वेष न हो मन में,
सर्वोपरि मानव का हित हो।।

कुछ कर्म करो इस भाँति सखे!
निज राष्ट्र-धर्म सम्मानित हो।

नर होने पर हो गर्व सदा,
नरता न कभी अपमानित हो।।

रचना-रामबली गुप्ता
मौलिक एवं अप्रकाशित

Views: 602

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Comment by रामबली गुप्ता on August 24, 2016 at 5:44pm
क्षमाप्रार्थी हूँ टंकण त्रुटि हो गयी है आद0 आशुतोष जी माँ को मान पढ़ा जाय
Comment by रामबली गुप्ता on August 24, 2016 at 5:42pm
रचना पर प्रतिक्रिया द्वारा माँ बढ़ाने के लिए हार्दिक आभार आद0 आशुतोष मिश्रा जी
Comment by रामबली गुप्ता on August 24, 2016 at 5:40pm
रचना पसन्द करने एवं उत्साहवर्धन हेतु सादर आभार आदरणीय जवाहर लाल जी
Comment by रामबली गुप्ता on August 24, 2016 at 5:39pm
प्रशंसा एवं प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार आदरणीय गोपाल नारायन जी
Comment by रामबली गुप्ता on August 23, 2016 at 10:17pm
आदरणीय श्याम नारायण वर्मा जी रचना पर प्रशंसा एवं प्रोत्साहन के लिए हृदय से आभार
Comment by Dr Ashutosh Mishra on August 23, 2016 at 11:57am
सार्थक सन्देश देती इस रचना के लिए हार्दिक बधाई आदरणीय
Comment by JAWAHAR LAL SINGH on August 23, 2016 at 10:43am

बहुत ही सुन्दर प्रभावी रचना आदरणीय रामबली गुप्ता जी!

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on August 22, 2016 at 9:24pm

आदरणीय रामबली जी , 16-16   बढ़िया  हिन्दी के शब्दों का सुन्दर उपयोग

Comment by Shyam Narain Verma on August 20, 2016 at 4:09pm
सुन्दर भाव पूर्ण रचना के लिये आपको बधाइयाँ ।

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