For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

"आप लोगों को आने में थोड़ी देर हो गयी, इनका ब्लड प्रेशर इतना कम हो चुका है कि आप लोग... किसी भी तरह की घटना के लिये तैयार रहें|" डॉक्टर के शब्द हल्के से उसके कान में पड़े, लेकिन वह तो इससे पहले ही समझ चुका था, कि मृत्यु उसके बहुत निकट है|

 

हस्पताल के बिस्तर पर लेटे हुए उसने इशारे से अपनी पत्नी और दोनों बेटों को बुलाया| उन तीनों का हृदय आने वाले समय की आशंका से बहुत तेज़ी से धड़क रहा था| वह उन्हें देखकर मुस्कुरा दिया| बड़े बेटे ने कहा, "पिताजी, आपको कुछ नहीं होगा, आप ठीक हो जायेंगे|"

 

उसके होंठों पर मुस्कान और गहरी हो गयी| बेटे ने यह देखकर भाव विह्वल आँखों के साथ अपने चेहरे को स्तुति भरी प्रशंसा की मुद्रा में हिलाया| अब उसने अपनी पत्नी और दूसरे बेटे को इशारे से पास बुलाया और मंद हो रहे स्वर से कहा,

"बड़ा मकान जो तुम दोनों को चाहिये था..... लोन के लिये परेशान था... अब मेरे पी.एफ. से..."

उसकी बात खत्म होने से पहले ही पत्नी की आँखों से आँसू झरझर बहने लगे और छोटे बेटे ने बिना कुछ कहे स्वीकृति की मुद्रा में सिर हिला दिया|

 

वह तब भी मुस्कुरा रहा था, उसने फिर अपने बड़े बेटे की तरफ देखा और आँखों के इशारे से उसे अपने पास बुलाया और पूछा, "तेरी भी कुछ... इच्छा है..."

 

बड़े बेटे ने हाँ में सिर हिलाया और कहा,

"पिताजी, मुझे घर चाहिये...."

 

और यह सुनते ही उसके होंठों पर गहरी मुस्कान की जगह गहरा दर्द आ गया|

(मौलिक और अप्रकाशित)

Views: 618

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on September 24, 2016 at 9:51pm

मकान और घर के अंतर को परिभाषित करती हुई बेहद मार्मिक कथा हुई है आदरणीय चंद्रेश भैया | हार्दिक बधाई |

Comment by Nita Kasar on September 6, 2016 at 7:24pm
बेहद संवेदनशील कथा है,कैसे लालची बेटे है जो पिता की भावनाऔ को समझ नही सकते।लानत है एेसी लालची संतान के लिये ।बधाई आपके लिये आद०चंद्रेश भाई जी ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on September 6, 2016 at 10:33am

आदरनीय सुन्दर, भाव पूर्ण ,मार्मिक कथा के लिये आपको हार्दिक बधाई ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by rajesh kumari on September 4, 2016 at 6:57pm

मकान और घर को परिभाषित करती हुई लघु कथा जो घर की अहमियत समझ गया समझो उसे सब कुछ मिल गया जो बड़े बेटे ने पा लिया |बहुत मार्मिक प्रस्तुति हार्दिक बधाई आपको आद० चंद्रेश जी |

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 4, 2016 at 5:02pm

मकान तो पी.एफ. से बन जायगा, परन्तु घर..... गहरे दर्द का अनुभव कराती  बहुत ही मार्मिक  लघुकथा  है आपकी, आदरणीय चंद्रेश जी। सादर बधाई 

Comment by kanta roy on September 4, 2016 at 4:07pm
पिता से धन पाने की लालसा ने बेटे के मन में बसा स्वार्थ की गिरह को खोल देती है जो पिता के विश्वास को हठात क्षीण कर गया। बहुत ही गहरी लघुकथा लेखन हुआ है आपका आदरणीय चंद्रेश जी। बधाई प्रेषित है।
Comment by Rahila on September 3, 2016 at 7:38pm
बहुत गहरी बात कह गयी आपकी रचना आदरणीय सर जी!खूब बधाई।सादर
Comment by Sheikh Shahzad Usmani on September 3, 2016 at 4:46pm
'मकान' और 'घर' की आकांक्षा और और उनके अन्तर पर गहराई से रौशनी डालती हुई रचना में 'अक्षम दाता' का मानसिक तनाव और अंतिम समय पर समस्या समाधान और परिवार के सदस्यों की भावनाओं व भाव-भंगिमाओं को बाख़ूबी चित्रित किया गया है बहुत बहुत हार्दिक बधाई और शुभकामनाएँ आपको आदरणीय चन्द्रेश कुमार छतलानी जी इस बेहतरीन प्रस्तुति के लिए।
Comment by Samar kabeer on September 3, 2016 at 3:10pm
जनाब चंद्रेश जी आदाब,बहुत ही मार्मिक लघुकथा लिखी है आपने,बहुत ख़ूब वाह, इस प्रस्तुति पर बधाई स्वीकार करें ।

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
1 hour ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"क्षमा कीजियेगा 'मुसाफ़िर' जी "
15 hours ago
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय भाई लक्ष्मण धामी 'मुसफ़िर' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला आपकी…"
yesterday
लक्ष्मण धामी 'मुसाफिर' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आ. भाई जयहिंद जी, सादर अभिवादन। सुंदर गजल हुई है। भाई रवि जी की सलाह से यह और निखर गयी है । हार्दिक…"
yesterday
Sushil Sarna posted a blog post

दोहा पंचक. . . दिल

दोहा पंचक. . . . . दिलरात गुजारी याद में, दिन बीता बेचैन । फिर से देखो आ गई, दिल की दुश्मन रैन…See More
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"ग़ज़ल 2122   1212  22 आ कभी देख तो ले फ़ुर्सत में क्या से क्या हो गए महब्बत में मैं…"
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Saurabh Pandey's blog post नवगीत - भैंस उसी की जिसकी लाठी // सौरभ
"  आपका हार्दिक धन्यवाद, आदरणीय लक्ष्मण धामी ’मुसाफिर’ जी   "
yesterday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on Sushil Sarna's blog post दोहा एकादश. . . . . पतंग
"आदरणीय सुशील सरनाजी, पतंग को लगायत दोहावलि के लिए हार्दिक बधाई  सुघड़ हाथ में डोर तो,…"
yesterday
Jaihind Raipuri commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय रवि भसीन 'शहीद' जी सादर अभिवादन बहुत शुक्रिया आपने वक़्त निकाला ग़ज़ल तक आए और हौसला…"
Wednesday
Sushil Sarna posted blog posts
Tuesday
रवि भसीन 'शाहिद' commented on Jaihind Raipuri 's blog post ग़ज़ल
"आदरणीय Jaihind Raipuri जी,  अच्छी ग़ज़ल हुई। बधाई स्वीकार करें। /आयी तन्हाई शब ए…"
Tuesday

सदस्य टीम प्रबंधन
Saurabh Pandey commented on रामबली गुप्ता's blog post कर्मवीर
"कर्मवीरों के ऊपर आपकी छांदसिक अभिव्यक्ति का स्वागत है, आदरणीय रामबली गुप्त जी.  मनहरण…"
Tuesday

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service