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ग़ज़ल...आँसुओं की आँख से सौगात बैरन आ गई

2122     2122     2122      212

तुम पिया आये नहीं बरसात बैरन आ गई 
दिन गुजारा बेबसी में रात बैरन आ गई

था हवाओं ने कहा मनमीत का सन्देश है 
ले जुदाई बेशरम की बात बैरन आ गई

ढोल ताशे बज उठे हैं गूंजती शहनाइयाँ 
हाय रे महबूब की बारात बैरन आ गई

मुट्ठियों में दिल समेटा होंठ भी भींचे खड़े 
आँसुओं की आँख से सौगात बैरन आ गई

भाइचारा भूल जाओ अब मियाँ तकरीर में 
धर्म मजहब आदमी की जात बैरन आ गई

लुट गया है घर घरौंदा बाढ़ में अरमां बहे 
फिर मदद के नाम पे खैरात बैरन आ गई

(मौलिक एवं अप्रकाशित)

बृजेश कुमार 'ब्रज'

Views: 833

Comment

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:48am

हार्दिक अभिनंदन एवं आभार आदरणिया  Alka Changa जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:47am

आपके आशीर्वाद से रचना सफल हुई आदरणीय  ram shiromani pathak जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:46am

ह्रदयतल से आभार आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण' जी

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:45am

सुंदर शब्दों में सराहना के लिए आपका हार्दिक आभार आदरणिया  Abha saxena जी प्रणाम करता हूँ 

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:43am

प्रणाम है आदरणीय  Samar kabeer जी यूँ ही ग़लतियों को सुधरते रहिए

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on September 17, 2016 at 11:41am

रचना पटल पे आपका हार्दिक अभिनंदन एवं आभार आदरणीय  सुनील प्रसाद(शाहाबादी) जी

Comment by अलका 'कृष्णांशी' on September 15, 2016 at 10:49pm

बहुत सुंदर ग़ज़ल।हार्दिक बधाई

Comment by ram shiromani pathak on September 14, 2016 at 8:18pm
बहुत सुंदर ग़ज़ल।हार्दिक बधाई भाई
Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on September 14, 2016 at 8:17pm
आदरणीय श्री ब्रजेश कुमार जी सुन्दर रचना है । बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Abha saxena Doonwi on September 14, 2016 at 12:49pm

ब्रजेश कुमार जी  वाह बहुत उम्दा ग़ज़ल बधाई ...स्वीकार करें ..

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