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ग़ज़ल - ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी ( गिरिराज भंडारी )

2122    1122    1122    22

बात सरहद पे अगर अब भी पुरानी होगी

तब दिलों मे हमें दीवार उठानी होगी

 

हर कहानी में हक़ीकत भी ज़रा होती है

ये हक़ीकत भी किसी रोज़ कहानी होगी

 

हाथ जिनके भी बग़ावत पे उतर आये हों

पैर में उनके भला कैसे रवानी होगी

 

सभ्य लोगों में असभ्यों की तरह बात तो कर

ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी

 

अपने अजदाद कभी राम-किसन-गौतम थे 

देखना घर मे बची कुछ तो निशानी होगी

 

रंग चांदी सा हुआ जाता है, अब बालों का

तिफ्ल खू सोच तेरी कब ये सयानी होगी

 

शब –ए- तारीक़ में जो रोज़ चमक उठती है   

रोशनी, चांद की फिर बात न मानी होगी

 

फिर किसी मौत का मजहब वो ले के आये हैं

कल किसी चौक पे फिर ज़हर बयानी होगी

****************************************

 मौलिक एवँ अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 23, 2016 at 1:49pm

आदरनीय समर भाई , गज़ल पर उपस्थिति और सराहना के लिये आपका हृदय से आभार ।

आदरणीय ऐबे तनाफुर  है , मै जानता हूँ , स्वीकार करता हूँ पर मुझे हटाने का कोई रास्ता नही मिल रहा था , अतः ऐसे ही रहने दिया हूँ , अगर कोई सही बात सूझी तो ज़रूर सुधार लूँगा , आपका आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on October 23, 2016 at 1:46pm

आदरणीय श्याम भाई , गज़ल की सराहना के लिये आपका हार्दिक आभार ।

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on October 23, 2016 at 12:29pm

आ० अनुज बहुत बेहतरीन गजल कही आपने -

हर कहानी में हक़ीकत भी ज़रा होती है

ये हक़ीकत भी किसी रोज़ कहानी होगी---- सादर

Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on October 23, 2016 at 11:30am
वाह आदरणीय बहुत ही खूबसूरत ग़ज़ल के लिए हार्दिक बधाइयाँ
Comment by DR. BAIJNATH SHARMA'MINTU' on October 22, 2016 at 10:48pm

आदरणीय , बेहतरीन ग़ज़ल ...........वाह -वाह ......सादर नमन व हार्दिक बधाई स्वीकार करें|

Comment by Dr. Vijai Shanker on October 22, 2016 at 11:18am
ये नई नस्ल है, तेरी भी दिवानी होगी।
बात बहुत गहराई की है , अर्थ पूर्ण। बधाई आदरणीय गिरिराज भंडारी जी , सादर।
Comment by Tasdiq Ahmed Khan on October 20, 2016 at 9:36pm


मोहतरम जनाब गिरिराज साहिब , अच्छी ग़ज़ल हुई है दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ---शेर 8 का ऊला मिसरा एक बार देख लीजिये
इसे यूँ करके देख लीजिये ---" लेके आए हैं किसी मौत का वो फिर मज़हब "

Comment by Samar kabeer on October 20, 2016 at 9:07pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।
चौथे शैर के ऊला मिसरे में ऐब-तनाफुर देखिएगा 'बात तो'
Comment by Shyam Narain Verma on October 20, 2016 at 11:32am
हार्दिक बधाइ स्वीकार करें इस बेहतरीन ग़ज़ल के लिए । सादर ।

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