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मेरे चेहरे पे कुछ लिखा है क्या (ग़ज़ल)

2122   1212   22

मुझको इस तरह देखता है क्या
मेरे चेहरे पे कुछ लिखा है क्या

बातें करता है पारसाई की
महकमे में नया-नया है क्या

आज बस्ती में कितनी रौनक है
कोई मुफ़लिस का घर जला है क्या

खोए-खोए हुए से रहते हो
प्यार तुमको भी हो गया है क्या

दिल मेरा गुमशुदा है मुद्दत से
फिर ये सीने में चुभ रहा है क्या

ढूँढ़ते रहते हैं ख़ुदा को सब
आजतक वो कभी मिला है क्या

लापता आजकल हैं "जय" साहब
आपको कुछ अता-पता है क्या

(मौलिक व अप्रकाशित)

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on November 12, 2016 at 8:44pm
वाह वाह क्या खूब लिखा...बहुतखूब

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on November 10, 2016 at 2:55pm

आदरणीय जयनित भाई , बहुत अच्छी गज़ल हुई है , मुबारकबाद कुबूल करें  ।

Comment by धर्मेन्द्र कुमार सिंह on November 9, 2016 at 7:57pm

उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं

Comment by जयनित कुमार मेहता on November 9, 2016 at 6:47pm

आदरणीय समर कबीर जी। रचना पर आपकी प्रतिक्रिया देखकर आत्मिक तृप्ति मिलती है। आपके मार्गदर्शन और उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभारी हूँ आपका।

Comment by Samar kabeer on November 9, 2016 at 4:54pm
जनाब जयनित कुमार मेहता जी आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फरमाएं ।

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