For any Query/Feedback/Suggestion related to OBO, please contact:- admin@openbooksonline.com & contact2obo@gmail.com, you may also call on 09872568228(योगराज प्रभाकर)/09431288405(गणेश जी "बागी")

अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ
तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ
कुछ भी कहने से डरता  हूँ
पीर हृदय की कह  न  सकूं
बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ
तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में
अधरों की हाला प्यासी है
स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के
पी बिन  घोर  उदासी  है

देह की अतृप्त धड़कन को ,निष्ठुर पलों का संगीत कहूँ
तुम  ही  बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय गीत कहूँ

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 914

Comment

You need to be a member of Open Books Online to add comments!

Join Open Books Online

Comment by Sushil Sarna on February 15, 2017 at 1:43pm

आदरणीय   Ram Asheryजी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by Ram Ashery on February 11, 2017 at 10:59pm

अति सुंदर रचना  आपने अपने मन की अभिव्यक्ति बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत की है आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो 

Comment by Sushil Sarna on January 7, 2017 at 1:20pm

आदरणीय   vijay nikore      जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by vijay nikore on January 7, 2017 at 11:38am

बहुत ही  सुन्दर गीत, भाव भी उच्च-कोटि के ... हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।

Comment by Sushil Sarna on December 28, 2016 at 4:43pm

आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण'  जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 27, 2016 at 8:01pm
आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।सादर।
Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:37pm

आदरणीय डॉ गोपाल  जी भाई साहिब प्रस्तुति को अपना मूल्यवान समय देकर उसके तकनीकि पक्ष से रूबरू करवाना  .... हृदय आपको नमन  करता है। प्रथम तो सृजन को प्रोत्साहन देने का हार्दिक आभार। आपके द्वारा इंगित मात्रिक त्रुटि को मैं सुधार कर इसे आपकी कसौटी पर खरा उतारने का पूरा प्रयास करूंगा। सृजन आपके मार्गदर्शन का दिल से आभारी है। 

Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:31pm

आदरणीय समर कबीर साहिब व्यस्तता के बीच भी आपका प्रस्तुति को अपना आशीर्वाद देना  ... दिल नमन एवम हार्दिक आभार व्यक्त करता है। 

Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:30pm

आदरणीय  Mahendra Kumar     जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 8:40pm

आ०  सरना जी , आपकी रचना 16 मात्रिक छंद पर चलकर बीच बीच में टूट गयी है यानी कि मात्राए पूर्ण नहीं रह पायी इससे गेयता बाधित हुयी है जैसे - 

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,   या टूटे मन की प्रीत कहूँ

2 2 1   1 2  2   2 1  1 2      2  2 2  2    2    2 1 1 2   (16,16) अरिल्ल की भाँति
तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,  मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

 2    2  1 2 2   2 2    2       2   2 2  2 2     2 1 1 2     (15,16) अरिल्ल में प्रत्येक चरण का प्रथम  अक्षर गुरु होता है जैसा अपने किया भी है पर 'तुम ही बताओ में प्रथम अक्षर गुरु न होने से गड़बड़ हो गयी . पूरी कविता इस निकष  पर कसेंगे तो लाजवाब गीत बन जाएगा. सादर .

कृपया ध्यान दे...

आवश्यक सूचना:-

1-सभी सदस्यों से अनुरोध है कि कृपया मौलिक व अप्रकाशित रचना ही पोस्ट करें,पूर्व प्रकाशित रचनाओं का अनुमोदन नही किया जायेगा, रचना के अंत में "मौलिक व अप्रकाशित" लिखना अनिवार्य है । अधिक जानकारी हेतु नियम देखे

2-ओपन बुक्स ऑनलाइन परिवार यदि आपको अच्छा लगा तो अपने मित्रो और शुभचिंतको को इस परिवार से जोड़ने हेतु यहाँ क्लिक कर आमंत्रण भेजे |

3-यदि आप अपने ओ बी ओ पर विडियो, फोटो या चैट सुविधा का लाभ नहीं ले पा रहे हो तो आप अपने सिस्टम पर फ्लैश प्लयेर यहाँ क्लिक कर डाउनलोड करे और फिर रन करा दे |

4-OBO नि:शुल्क विज्ञापन योजना (अधिक जानकारी हेतु क्लिक करे)

5-"सुझाव एवं शिकायत" दर्ज करने हेतु यहाँ क्लिक करे |

6-Download OBO Android App Here

हिन्दी टाइप

New  देवनागरी (हिंदी) टाइप करने हेतु दो साधन...

साधन - 1

साधन - 2

Latest Activity

अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"चौपाई छंद ( संशोधित ) ++++++++++++++++   ठंड गई तो फागुन आया। जन मानस में खुशियाँ लाया॥ आम…"
37 minutes ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"बाल-युवा मिल उधम मचाएं, रंग-गुलाल-अबीर उड़ाएं  वाह !!! अजय भाई इससे बढ़िया और क्या…"
43 minutes ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"लघुकथा पर अच्छा प्रयास हुआ है अखिलेश भाई। पढ़ने में रोचक तो है। विशेष टिप्पणी तो इस विधा के जानकार…"
1 hour ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"छंदों पर अपनी प्रतिक्रिया से उत्साहवर्धन के लिए हार्दिक आभार आदरणीय भाई अखिलेश जी।  मात्रा की…"
1 hour ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय भाई अखिलेश जी, आपको भी नववर्ष 2083 की अनेक शुभकामनाएं।  उपरोक्त चर्चा को आगे बढ़ाते हुए…"
1 hour ago
अजय गुप्ता 'अजेय replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"वैसे आप मूल शेर में ही  दौलत-ए-ग़म मिली है क़िस्मत से // कर दें तो भी बह्र बरक़रार रहती है। और…"
1 hour ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion "ओबीओ लाइव लघुकथा गोष्ठी" अंक-132 (विषय मुक्त)
"अनुरोध - कर्कश स्वर को पंचम स्वर पढ़ें ...... धन्यवाद "
3 hours ago
amita tiwari posted a blog post

प्यादे मान लिये जाते हैं मात्र एक संख्या भर

प्यादे : एक संख्या भरप्यादे— बेकसूर, बेख़बर, नियति और नीति से अनजान—अक्सर मान लिये जाते हैंमात्र एक…See More
6 hours ago
Tilak Raj Kapoor replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"अच्छा है। "
14 hours ago
Manjeet kaur replied to Admin's discussion "ओ बी ओ लाइव तरही मुशायरा" अंक-189
"आदरणीय , ग़ज़ल के दूसरे शेर       'ग़म-ए-दौलत मिली है किस्मत से…"
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"विषय मुक्त होने के कारण लघु कथा लिखने का प्रयास किया है , अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त…"
15 hours ago
अखिलेश कृष्ण श्रीवास्तव replied to Admin's discussion 'ओबीओ चित्र से काव्य तक' छंदोत्सव अंक 177 in the group चित्र से काव्य तक
"आदरणीय अजय भाईजी  फागुन आया ऐसा छाया, बाग़ आम का है बौराया भरी मंजरी ने तरुणाई, महक रही सारी…"
15 hours ago

© 2026   Created by Admin.   Powered by

Badges  |  Report an Issue  |  Terms of Service