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अक्षय गीत ....

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,या टूटे मन की प्रीत कहूँ
तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

मैं पग पग  आगे  बढ़ता  हूँ
कुछ भी कहने से डरता  हूँ
पीर हृदय की कह  न  सकूं
बन दीप शलभ मैं जलता हूँ

शशांक का विरह गीत कहूँ,या रैन की निर्दयी रीत कहूँ
तुम ही बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय  गीत कहूँ

अतृप्त तृषा  है. घूंघट  में
अधरों की हाला प्यासी है
स्वप्न नीड़  पर  नयनों  के
पी बिन  घोर  उदासी  है

देह की अतृप्त धड़कन को ,निष्ठुर पलों का संगीत कहूँ
तुम  ही  बताओ  कैसे  प्रिय , मैं  कोई  अक्षय गीत कहूँ

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment by Sushil Sarna on February 15, 2017 at 1:43pm

आदरणीय   Ram Asheryजी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by Ram Ashery on February 11, 2017 at 10:59pm

अति सुंदर रचना  आपने अपने मन की अभिव्यक्ति बहुत ही सुंदर ढंग से प्रस्तुत की है आपको बहुत बहुत बधाई स्वीकार हो 

Comment by Sushil Sarna on January 7, 2017 at 1:20pm

आदरणीय   vijay nikore      जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by vijay nikore on January 7, 2017 at 11:38am

बहुत ही  सुन्दर गीत, भाव भी उच्च-कोटि के ... हार्दिक बधाई आदरणीय सुशील सरना जी।

Comment by Sushil Sarna on December 28, 2016 at 4:43pm

आदरणीय  सुरेश कुमार 'कल्याण'  जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by सुरेश कुमार 'कल्याण' on December 27, 2016 at 8:01pm
आदरणीय सुशील सरना जी बहुत ही सुन्दर रचना के लिए हार्दिक बधाई स्वीकार करें।सादर।
Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:37pm

आदरणीय डॉ गोपाल  जी भाई साहिब प्रस्तुति को अपना मूल्यवान समय देकर उसके तकनीकि पक्ष से रूबरू करवाना  .... हृदय आपको नमन  करता है। प्रथम तो सृजन को प्रोत्साहन देने का हार्दिक आभार। आपके द्वारा इंगित मात्रिक त्रुटि को मैं सुधार कर इसे आपकी कसौटी पर खरा उतारने का पूरा प्रयास करूंगा। सृजन आपके मार्गदर्शन का दिल से आभारी है। 

Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:31pm

आदरणीय समर कबीर साहिब व्यस्तता के बीच भी आपका प्रस्तुति को अपना आशीर्वाद देना  ... दिल नमन एवम हार्दिक आभार व्यक्त करता है। 

Comment by Sushil Sarna on December 26, 2016 at 2:30pm

आदरणीय  Mahendra Kumar     जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का  दिल से आभार। 

Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 25, 2016 at 8:40pm

आ०  सरना जी , आपकी रचना 16 मात्रिक छंद पर चलकर बीच बीच में टूट गयी है यानी कि मात्राए पूर्ण नहीं रह पायी इससे गेयता बाधित हुयी है जैसे - 

मैं हार कहूँ या जीत कहूँ ,   या टूटे मन की प्रीत कहूँ

2 2 1   1 2  2   2 1  1 2      2  2 2  2    2    2 1 1 2   (16,16) अरिल्ल की भाँति
तुम ही बताओ कैसे प्रिय ,  मैं कोई अक्षय गीत कहूँ

 2    2  1 2 2   2 2    2       2   2 2  2 2     2 1 1 2     (15,16) अरिल्ल में प्रत्येक चरण का प्रथम  अक्षर गुरु होता है जैसा अपने किया भी है पर 'तुम ही बताओ में प्रथम अक्षर गुरु न होने से गड़बड़ हो गयी . पूरी कविता इस निकष  पर कसेंगे तो लाजवाब गीत बन जाएगा. सादर .

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