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कह्र ...

थक गयी है
लबों पे हंसी
शायद लब
आडम्बर का ये बोझ
और न सहन कर पाएंगे
संग अंधेरों के
ये भी चुप हो जाएंगे
कफ़स में कहकहों के
दर्द बेवफाई का
ये छुपा न पाएंगे
बावज़ूद
लाख कोशिशों के
ये
गुज़रे हुए
लम्हों की आतिश से
बंद पलकों से
पिघल कर
तकिये को
गीला कर जाएंगे
सहर की पहली शरर पे
रिस्ते ज़ख्मों का
कह्र लिख जाएंगे


सुशील सरना

मौलिक एवम अप्रकाशित 

Views: 681

Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on December 29, 2016 at 7:10am
आदरणीय सुशील सरना जी बढ़िया रचना, बधाई, कुछ पंक्तिया तो बहुत ही खुबसूरत बन पड़ी हैं
Comment by Samar kabeer on December 28, 2016 at 8:41pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,"क़ह्र" उन्वान से बहुत कविता लिखी आपने,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on December 28, 2016 at 7:44pm

बढ़िया आ० सरना जी

Comment by KALPANA BHATT ('रौनक़') on December 28, 2016 at 6:43pm
वाह ।
थक गयी है
लबों पे हंसी
शायद लब
आडम्बर का ये बोझ
और न सहन कर पाएंगे

बेहद सुन्दर पंक्तियाँ । हार्दिक बधाई सर ।

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