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ग़ज़ल...बे-रंग-ओ-बू है ये ज़िंदगानी

121 22 121 22 121 22 121 22
बशर परेशां दरकतीं राहें पहाड़ सी ज़िन्दगी हुई है
कदम जहाँ सकपका के रक्खा वहीँ ज़मीं दलदली हुई है

बे-रंग-ओ-बू है ये ज़िंदगानी हँसी सा कोई मक़ाम दे दो
कि ये उदासी मेरे लवों पे कई दिनों से बसी हुई है

जिन्हें संभाला जिन्हें सँवारा वो ख्वाब जाने क्यों रूठ बैठे
सुबह से पलकों पे ओस आई औ आँख भी शबनमी हुई है

कफ़स से तो हम निकाल लाये मगर छुपाया ज़माने भर से
कि शूल बन कर वही सदा अब ह्रदय के अन्दर चुभी हुई है

अज़ब तमाशा है तेरा मौला क्या खूब तेरी है रहनुमाई
वहीँ वहीँ पे गिरी बिजुरिया जहाँ जरा रौशनी हुई है

(मौलिक एवं अप्रकाशित)
बृजेश कुमार 'ब्रज'

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Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on January 5, 2017 at 8:29pm
आपकी सुन्दर एवं सार्थक समीक्षात्मक टिप्पड़ी सदैव ही मनोवल बढ़ाने वाली होती है...आदरणीय समर कबीर जी☺आदरणीय आपने ध्यानाकर्षण किया है तो निश्चय ही कमी होगी...लेकिन मैं पहुँच नहीं पा रहा हूँ..आप इंगित कर देंगे तो आसानी होगी☺
Comment by डॉ गोपाल नारायन श्रीवास्तव on January 5, 2017 at 7:53pm

आ ०  बेहद उम्दा गजल हुयी है, सादर ,

Comment by नाथ सोनांचली on January 5, 2017 at 12:15pm
जनाब बृजेश जी सादर अभिवादन, आपकी गजल बेहद उम्दा हुयी है, हर शैर पर दाद हाजिर है
Comment by Samar kabeer on January 5, 2017 at 10:42am
जनाब बृजेश कुमार 'ब्रज'साहिब आदाब,उम्दा ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद क़ुबूल फ़रमाएं ।
दूसरे शैर का ऊला मिसरा लय में नहीं है,देखियेगा ।

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