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हिम बसंत ...

प्रथम प्रणय का
प्रथम पंथ हो
हिय व्यथा का
तुम ही अंत हो
शिशिर ऋतु का
शिशिरांशु हो
विरह पलों का
शिशिरांत हो
शीत पलों की
मधुर सिहरन हो
नयन सिंधु का
मौन कंपन्न हो
मधु पलों में
मेरे प्रिय तुम
मधु स्मृतियों का
हिम बसंत हो

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 457

Comment

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Comment by Sushil Sarna on January 11, 2017 at 1:40pm

आदरणीय  vijay nikore जी प्रस्तुति के भावों को अपनी स्नेहाशीष देने का हार्दिक आभार।

Comment by vijay nikore on January 11, 2017 at 1:27pm

 सुन्दर, अति सुन्दर। हार्दिक बधाई, आदरणीय सुशील जी।

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 5:18pm

आदरणीय  Samar kabeer जी प्रस्तुति को अपनी स्नेह वचनों से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Samar kabeer on January 10, 2017 at 3:03pm
जनाब सुशील सरना जी आदाब,बहुत सुंदर लगी ये कविता भी,इस प्रस्तुति पर दिल से बधाई स्वीकार करें ।
Comment by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 2:07pm

आदरणीय डॉ आशुतोष जी प्रस्तुति के भावों को अपनी स्नेहाशीष देने का हार्दिक आभार।

Comment by Sushil Sarna on January 10, 2017 at 2:07pm

आदरणीय मिथिलेश वामनकर जी प्रस्तुति को अपनी स्नेह वचनों से अलंकृत करने का हार्दिक आभार।

Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 10, 2017 at 3:41am
आदरणीय शुशील जी इस रसचना पर तहे दिल बधाई स्वीकार करें सादर

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 10, 2017 at 12:46am

आदरणीय सुशील सरना सर, बहुत बढ़िया भावाभिव्यक्ति हुई है. इस प्रस्तुति के लिए हार्दिक बधाई. निवेदित है. सादर 

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