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ग़ज़ल --दर्द की तासीर बन दिल में ठहर जाते हैं लोग

2122 2122 2122 212

इस तरह कुछ जोश में हद से गुज़र जाते हैं लोग।
जुर्म की हर इन्तिहाँ को पार कर जाते हैं लोग ।।

हर तरफ जलते मकाँ है आदमी खामोश है ।
कुछ सुकूँ के वास्ते जाने किधर जाते हैं लोग ।।

अहमियत रिश्तों की मिटती जा रही इस दौर में ।
है कोई शमशान वह अक्सर जिधर जाते हैं लोग ।।

यह शिकन ज़ाहिर न हो चेहरा न हो जाए किताब।
आईने के सामने कितना सवर जाते हैं लोग।।

गाँव खाली हो रहा कुछ रोटियों की फेर में ।
माँ का आँचल छोड़ कर देखो शहर जाते हैं लोग।।

बाप की थीं ख्वाहिशें बेटा निभाए उम्र तक ।
हो बुढ़ापे का तकाजा तो मुकर जाते हैं लोग ।।

देखिये मतलब परस्ती का ज़माना आ गया ।
मांगिये थोड़ी मदद तो खूब डर जाते हैं लोग ।।

कौन कहता दौलतों से वास्ता उनका नहीं ।
कुर्सियो पर बैठकर काफ़ी निखर जाते हैं लोग ।।

ऐ मुसाफिर यह हक़ीक़त भी हमे मालूम है ।
इश्क़ में कुछ ठोकरें खाकर बिखर जाते हैं लोग ।।

बिक गया मजबूरियों के नाम पर वह हुस्न भी ।
घुंघरुओं के बज्म में चारो पहर जाते हैं लोग ।।

भूल जाना भी मुकद्दर का बड़ा तोहफ़ा यहां ।
दर्द की तासीर बन दिल में ठहर जाते हैं लोग ।।

--नवीन मणि त्रिपाठी
मौलिक अप्रकाशित

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सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on January 11, 2017 at 9:40pm

आदरणीय नवीन भाई , गज़ल बहुत अच्छी हुई है , हृदय से बधाइयाँ  प्रेषित हैं , स्वीकार करें । आदरणीय समर भाई जी की सलाहों पर गौर कीजियेगा ।

Comment by vijay nikore on January 11, 2017 at 1:26pm

आपकी गज़ल पढ़ कर आनन्द आ गया। बधाई।

Comment by Naveen Mani Tripathi on January 9, 2017 at 4:53pm
आ0 कबीर साहब सादर नमन सर । अवश्य सुधार करता हूँ ।
Comment by Samar kabeer on January 9, 2017 at 2:27pm
जनाब नवीन मणि त्रिपाठी जी आदाब,बहुत उम्दा ग़ज़ल हुई है,शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
कुछ मिसरों में टाइपिंग मिस्टेक है उसे दरुस्त कर लें ।
मतले के सानी मिसरे में 'इन्तिहाँ'को "इन्तिहा"करें ।
चौथे शैर में 'सवर' को सँवर"कर लें ।
पांचवें शैर में 'शहर'क़ाफ़िया उर्दू के हिसाब से मान्य नहीं है ।
दसवें शैर में ऐब-ए-तनाफ़ुर है 'बज़्म में',और दूसरी बात ये कि "बज़्म"स्त्रीलिंग है इसलिये 'घुंघरुओं के'नहीं "घुंघरुओं की"होना चाहिये ।
Comment by Dr Ashutosh Mishra on January 9, 2017 at 7:59am
आदरणीय नवीन जी इस ग़ज़ल को बार बार पढ़ा आपकी ग़ज़ल इंसान के चरित्र का बाखूबी वर्णन है मंत्रमुग्ध करती इस शानदार ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई सादर
Comment by नाथ सोनांचली on January 9, 2017 at 3:47am
आद0 नवीन मणि त्रिपाठी जी सादर अभिवादन, उम्दा ग़ज़ल। पर दाद हाजिर है, दिली मुबारकबाद कबूल फरमाये, सादर
Comment by Naveen Mani Tripathi on January 8, 2017 at 11:13pm
आदरणीय मिथिलेश वामनकर साहब सादर आभार । आपकी बात से सहमत हूँ । शहर को 2 1 पर ही लेना उचित है । पर ग़ज़ल पढ़ने की चीज है जो पढ़ते है वही वजन ले लिया । कुछ हिंदी उच्चारण को घुसपैठ कराने की साजिश थी । सादर नमन ।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on January 8, 2017 at 9:46pm

आदरणीय नवीन मणि त्रिपाठी जी, बहुत बढ़िया ग़ज़ल कही है आपने. दाद ओ मुबारकबाद कुबूल फरमाएं. शहर काफ़िया मुझे व्यक्तिगत रूप से अजीब लगा लेकिन यह बहस पुरानी हो गई है और अब इस शब्द का जैसा प्रयोग आम हो चला है उस हिसाब से सही है. सादर 

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