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कुछ मुक्तक/सतविन्द्र कुमार राणा

(16 14 मात्रा भार)
.
(1)
हाथ जोड़ कर फिरते दिखते जब-जब सीजन आता है
दर-दर पर मिन्नत होती है हर इक जन तब भाता है
काम साध कुर्सी को पाकर याद नहीं फिर कुछ आता
झुककर जो वादे कर जाते उनको कौन निभाता है?

(2)
मौसम जैसा हाल सजन का समझ नहीं कुछ आता है
इस पल होता है तौला उस पल माशा बन जाता है
प्रीत हमारी लगती झूठी जाने क्या दिल में रखते?
वादे उनके ऐसे लगते ज्यों नेता कर जाता है।

(3)
आँखों को झूठा मत समझो आँखें सच ही कहती हैं
बात ज़ुबाँ ने नहीं कही जो आँखों में वे रहती हैं
आँखें बनती दर्पण सबका अक्स दिखाती जो सबको
दर्द-ख़ुशी दोनों को लेकर आँखें चुप-चुप बहती हैं।

(4)
जीवन पुष्प समान रहे जो छोटा हो पर पूरा हो
खिलकर दे ये खुशियाँ सबको और सुगंधित चूरा हो
इत्र बने सबको महकाए फल का भी आधार बने
परहित में जो जान लुटाए निश्चय  नहीं अधूरा हो।

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on March 6, 2017 at 9:29pm
आदरणीय महेंद्र जी प्रोत्साहन के लिए सादर आभार।
Comment by Mahendra Kumar on February 25, 2017 at 8:10pm
आदरणीय सतविंद्र जी,बढ़िया मुक्तक हैं। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर
Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2017 at 6:32pm
आदरणीय आरिफ जी सादर नमन्!प्रयास का अनुमोदन कर सराहने के लिए तहेदिल शुक्रिया।
Comment by Mohammed Arif on February 22, 2017 at 5:13pm
आदरणीय सतविंद्र जी आदाब, सामयिक मुक्तक कहें हैं आपने । बधाई स्वीकार करें ।

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