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22 22 22 2
भले ही' मैं अंजाना हूँ
सारी बात समझता हूँ

कड़वा चाहे लगता हूँ
सच की रो में बहता हूँ।

सुख दुख के हर पहलू को
चुपके-चुपके सहता हूँ।

बोल रहा उनके आगे
जिनको सुनता आया हूँ।

काम बहुत करना मुझको
लेकिन मैं अलसाया हूँ।

जख्म नहीं हूँ दे सकता
जब मरहम के जैसा हूँ

देख भुलाकर रंजो गम
गुल बनकर फिर महका हूँ।

जिससे धारा फ़ूट पड़े
टूटा वही किनारा हूँ।

आँखों में क्या ढूँढ रहे
दिल के अंदर रहता हूँ।

राह सफर सब लंबे हैं
चलने को ही ठहरा हूँ।

भीड़ भरी सब राहों में
*अपनी धुन में रहता हूँ।*

मौलिक एवं अप्रकाशित

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Comment

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Comment by सतविन्द्र कुमार राणा on February 22, 2017 at 8:17pm
आदरणीय दिनेश भाई अनुमोदन एवं प्रोत्साहन के लिए तहेदिल शुक्रिया!
आदरणीय अशोक कुमार रक्ताले जी प्रोत्साहन एवं मार्गदर्शन के लिए तहेदिल शुक्रिया,वांछित परिमार्जन कर लिया गया है।सादर
आदरणीय मोहम्मद आरिफ जी ज़र्रानवाज़ी के लिए तहेदिल शुक्रिया
आदरणीय शिज्जु शकूर जी सादर नमन,मार्गदर्शन एवं प्रोत्साहन के लिए तहेदिल शुक्रिया
आदरणीय समर कबीर जी,आदरणीय मिथिलेश जी,आदरणीय जयनित भाई आप सबको सादर आभार संग हारदिक नमन।यथोचित प्रयास किया है परिमार्जन के लिए।आप सबके सुझाव अनुरूप सही हुआ होगा ऐसी आशा है।सादर
Comment by जयनित कुमार मेहता on February 9, 2017 at 9:17pm
आदरणीय सतविंद्र जी, अच्छी ग़ज़ल हुई है। परिमार्जन की संभावनाओं को गुणीजन इंगित कर ही चुके हैं, आशा है आप उनका लाभ उठाएंगे। सादर।।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by मिथिलेश वामनकर on February 8, 2017 at 3:57pm

आदरणीय सतविन्द्र जी, बढ़िया ग़ज़ल कही है. हार्दिक बधाई. बाकी गुनीजन कह ही चुके हैं. सादर 

Comment by Dr Ashutosh Mishra on February 7, 2017 at 4:50pm

आदरणीय सतविंदर जी इस सुंदर छोटी बिधा में लगी सुन्दर ग़ज़ल के लिए ढेर सारी बधाई स्वीकार करें सादर 

Comment by Samar kabeer on February 6, 2017 at 6:01pm
जनाब सतविन्दर कुमार'राणा'साहिब आदाब,अच्छी ग़ज़ल हुई है,दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
जनाब रक्ताले साहिब और जनाब शिज्जु साहिब से सहमत हूँ ।
चौथे शैर का ऊला बह्र में नहीं :-
'बोल रहा हूँ उनके आगे'
"बोल रहा उनके आगे"

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on February 6, 2017 at 5:47pm

आ. सतविंद्र कुमार जी छोटी बह्र में तरही ग़ज़ल अच्छी हुई है, ये कुछ सुझाव हैं यदि मुनासिब लगे

काम बहुत करना मुझको
लेकिन मैं अलसाया हूँ।

निम्नलिखित शेर का अर्थ कुछ साफ नहीं है,
जख्म नहीं हूँ दे सकता
बस मरहम के जैसा हूँ

Comment by Mohammed Arif on February 6, 2017 at 5:39pm
आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी आदाब, बेहरीन ग़ज़ल हुई है । तहेदिल से बधाई ।
Comment by Ashok Kumar Raktale on February 6, 2017 at 1:25pm

आदरणीय सतविन्द्र कुमार जी सादर, हुस्ने मतला तो जोरदार है किन्तु मतला कुछ कमजोर लग रहा है. बाकी अशआर खूबसूरत हुए हैं. बहुत-बहुत बधाई स्वीकारें. 

जिससे धारा फ़ूट पड़े
टूटा एक किनारा हूँ।.........'एक' की जगह 'वही' यहाँ अधिक उपयुक्त होता. सादर. 

 

Comment by दिनेश कुमार on February 6, 2017 at 7:00am
अच्छी ग़ज़ल हुई है आ सतविंदर भाई। वाह वाह

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