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अनबहा समंदर ....

अनबहा समंदर ....

थी
गीली
तुम्हारी भी
आंखें


थी
गीली
हमारी भी
आंखें


बस
फ़र्क ये रहा
कि तुमने कह दी
अपने दिल की बात
हम पर गिरा के
जज़्बातों से लबरेज़
लावे सा गर्म
एक आंसू
और
हमें
न मिल सका
वक़्ते रुख़सत से
एक लम्हा
अपने जज़्बात
चश्म से
बयाँ करने का
चल दिए
अफ़सुर्दा सी आँखों में समेटे
जज़्बातों का
अनबहा
समंदर

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

Views: 590

Comment

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Comment by Sushil Sarna on March 6, 2017 at 5:52pm

आदरणीय  Mahendra Kumar जी प्रस्तुत्ति के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Mahendra Kumar on March 5, 2017 at 1:06pm
आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत बढ़िया कविता है। हार्दिक बधाई स्वीकार कीजिए। सादर।
Comment by Sushil Sarna on March 4, 2017 at 1:58pm

आदरणीय  सुरेन्द्र नाथ सिंह 'कुशक्षत्रप' जी ये आपका स्नेह है की आपने ज़र्रे को आफ़ताब का ख़िताब दे दिया। प्रस्तुति में निहित भावों को अपने आत्मीय सम्मान से पल्लवित करने का तहे दिल से शुक्रिया। 

Comment by 
Comment by नाथ सोनांचली on March 4, 2017 at 6:31am
आद0 सुशील सरना जी सादर अभिवादन। हम तो आपके इस शैली के कायल है भाई, क्या खूबसूरती से बिम्ब बनाते है औऱ बेहद सधे हुए अंदाज में भावो को व्यक्त करते है, उम्दा, बधाई।सादर।
Comment by Sushil Sarna on March 3, 2017 at 3:27pm

आदरणीय आशीष यादव जी प्रस्तुत्ति के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by आशीष यादव on March 3, 2017 at 7:34am
भावाभिव्यक्ति गहराईयों तक
Comment by Sushil Sarna on March 2, 2017 at 8:33pm

आदरणीय Mohammed Arif साहिब प्रस्तुत्ति के भावों को आत्मीय मान देने का तहे दिल से शुक्रिया।

Comment by Mohammed Arif on March 1, 2017 at 5:23pm
आदरणीय सुशील सरना जी आदाब, हमेशा की तरह वही अंदाज, वही जादू , वही कशिश । बधाई स्वीकार करेंं।

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