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मैं चुप रही ....

रात के पिछले पहर
पलकों की शाखाओं पर
कुछ कोपलें
ख़्वाबों की उग आई थीं
याद है तुम्हें
तुम ने
चुपके से
मेरे ख्वाबों की
कुछ कोपलें
चुराई थीं
मैं चुप रही

तुमने
अपने स्पर्श से
उनमें बैचैनी का
सैलाब भर दिया
मैं चुप रही

तुमने
मेरी पलकों की
शाखाओं पर
अपने अधरों से
सुप्त तृष्णा को
जागृत किया
मैं चुप रही

रात की उम्र
ढलती रही
कोपलें
ख़्वाबों की
पलकों के
अतृप्त आँगन में
शनैः शनैः
झरती रही
तुम भी आखिर
ख्वाब ही निकले
मेरे ख्वाब की
हर कोपल तोड़
तुम भी
आखिर ख्वाब की तरह
मेरी झोली को
प्रतीक्षा पलों से भर
चुपचाप चल दिए
और
मैं चुप रही

सुशील सरना
मौलिक एवम अप्रकाशित

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Comment

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Comment by Sushil Sarna on April 12, 2017 at 2:52pm

आदरणीय गिरिराज जी भाई साहिब प्रस्तुति को अपनी आत्मीय प्रशंसा से शोभित करने का हार्दिक आभार। 


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on April 9, 2017 at 7:09am

आदरनीय सुशील भाई , खूब सूरत विरह - कविता के लिये हार्दिक बधाइयाँ ।

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 8:07pm

आद. Mahendra Kumar जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

Comment by Mahendra Kumar on April 7, 2017 at 7:53pm
आदरणीय सुशील सरना जी, बहुत बढ़िया प्रस्तुति है। हार्दिक बधाई प्रेषित है। सादर।
Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 6:46pm

आ. narendrasinh chauhan जी सृजन आपकी मधुर प्रतिक्रिया का हार्दिक आभारी है। 

Comment by narendrasinh chauhan on April 7, 2017 at 6:28pm

खूब सुन्दर रचना 

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 1:26pm

आ. तेज वीर सिंह जी सृजन आपकी मधुर प्रतिक्रिया का हार्दिक आभारी है। थैंक्स 

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 1:26pm

आ.मोहमद आरिफ साहिब सृजन आपकी हृदयग्राहि अभिव्यक्ति से उपकृत हुआ।  हार्दिक आभार। 

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 1:26pm

आदरणीया कल्पना भट्ट जी प्रस्तुति आपकी मन मुदित करती प्रशंसा की हार्दिक आभारी है। 

Comment by Sushil Sarna on April 7, 2017 at 1:26pm

आदरणीया राजेश कुमारी जी प्रस्तुति के भावों को आत्मीय मान देने का हार्दिक आभार। 

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