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ग़ज़ल - क्या कज़ा को हयात कहता है ? ( गिरिराज भंडारी )

2122  1212  22 /112

क़ैद को क्यों नजात कहता है

क्या कज़ा को हयात कहता है ?

 

तीन को अब जो सात कहता है

बस वही ठीक बात कहता है

 

क्यूँ न तस्लीम  उसको कर लूँ मैं

वो मिरे दिल की बात कहता है

 

कैसे कह दूँ कि वास्ता ही नहीं

रोज़ वो शुभ प्रभात कहता है

 

ऐतराज उसको है शहर पे बहुत

हाथ अक्सर जो हात कहता है

 

उसकी बीनाई भी है शक से परे   

जो सदा दिन को रात कहता है

 

जीत जब भी मिली, वो क़ाबिल था

मात को फर्जी मात कहता है

 

ज़ेह’न बदला नहीं मिरा अब तक

दर्द, अब भी निशात कहता है 

*****************************

मौलिक एवँ अप्रकाशित

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Comment

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Comment by नाथ सोनांचली on May 9, 2017 at 1:45am
भाई गिरिराज जी सादर अभिवादन, उम्दा ग़ज़ल के लिए हृदय से बधाई निवेदित है।

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 7:54pm

आदरनीय समर भाई , गज़ल पर उपस्थिति के लिये हृदय से आभार .... और जानकारी के लिये मंच की ओर से आभार व्यक्त करता हूँ .....


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 7:51pm

आदरनीय राम अवध भाई , गज़ल पर उपस्थिति और सराहना के लिये आभार आपका ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 7:50pm

आदरनीय रवि भाई , मेरी गज़ल आप्को कुछ मजे दे पायी जान कर खुशी हुई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हृदय से आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 7:49pm

आदरणीय मो. आरिफ भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका हार्दिक आभार ।


सदस्य कार्यकारिणी
Comment by गिरिराज भंडारी on May 8, 2017 at 7:48pm

आदरनीय कक्ष्मण भाई , उत्साह वर्धन के लिये आपका ह्र्दय से आभार ।

Comment by Ram Awadh VIshwakarma on May 8, 2017 at 7:18pm
आदरणीय गिर्राज जी
आपकी हर ग़ज़ल नये तेवर के साथ आती है। बधाई स्वीकारें।
Comment by Samar kabeer on May 8, 2017 at 6:44pm
जनाब गिरिराज भंडारी जी आदाब,ग़ज़ल पर कोई टिप्पणी नहीं दूंगा,यहां मंच को ये बताने के लिये हाज़िर हुआ हूँ कि आख़री शैर में क़ाफ़िया दोष है,'निशात'शब्द में 'तोय'है और क़ाफिये 'त'के चल रहे हैं ।
Comment by Ravi Shukla on May 8, 2017 at 1:42pm

आदरणीय गिरिराज भाई जी अापकी गजल का मजा ले रहे है बहुत बहुत बधाई इस गजल के लिये ।

Comment by Mohammed Arif on May 8, 2017 at 12:51pm
आदरणीय गीरिराज भंडारी जी आदाब, बहुत बेहतरीन ग़ज़ल । बधाई स्वीकार करें । बाक़ी गुणीजन अपनी राय देंगे ।

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