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नूर की हिंदी ग़ज़ल ..दर्पणों से कब हमारा मन लगा

२१२२/२१२२/२१२ 
.
दर्पणों से कब हमारा मन लगा
पत्थरों के मध्य अपनापन लगा. 
.
लिप्त है माया में अपना ही शरीर
ये समझ पाने में इक जीवन लगा.
.
तप्त मरुथल सी ह्रदय की धौंकनी
हाथ जब उस ने रखा चन्दन लगा.
.
मूर्खता पर करते हैं परिहास अब
जो था पीतल वो हमें कुन्दन लगा.
.
प्रेम में भी कसमसाहट सी रही
प्रेम मेरा आपको बन्धन लगा.
.
जल रहे हैं हम यहाँ प्रेमाग्नि में
और उस पर ये मुआ सावन लगा.
.
मंदिरों की सीढ़ियों पर भूख थी 
चन्द्र भिक्षापात्र सा बर्तन लगा.
.
माँ को अम्मी कह रहा था मित्र, बस!
उसका आँगन अपना ही आँगन लगा.         
.
निलेश "नूर"
.
मौलिक/ अप्रकाशित 

Views: 1589

Comment

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Comment by Dr Ashutosh Mishra on May 9, 2017 at 6:50pm
आदरणीय नीलेश भाई इस शेर ने तो मंत्रमुग्ध कर दिया आपके हुनर का ये रंग भी खूब भाया। कमाल है पूरे ग़ज़लाँ को अम्मी कह रहा था मित्र, बस! ढेर सारी बधाई उसका आँगन अपना ही आँगन लगा.
Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 6:21pm

शुक्रिया आ. समर सर,,,,
आभार 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 6:20pm

शुक्रिया आ. बृजेश जी,,,,,
युग्म नहीं शेर हैं....क्यूँ कि मैं हिंदी ग़ज़ल को गीतिका नहीं मानता ...
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 6:19pm

शुक्रिया आ. शिज्जू भाई 

Comment by Samar kabeer on May 9, 2017 at 6:02pm
जनाब निलेश'नूर'साहिब आदाब,क्या ही शानदार धमाकेदार ख़ालिस हिन्दी ग़ज़ल कही है,मज़ा आ गया जितनी चाहे दाद लीजिये,बहुत ख़ूब वाह वाह -
'इस ग़ज़ल की क्या लिखूँ तारीफ़ मैं
शाइरी का मुझको ये मधुबन लगा'
शैर दर शैर दाद के साथ मुबारकबाद पेश करता हूँ ।
Comment by बृजेश कुमार 'ब्रज' on May 9, 2017 at 5:42pm
आहा..सुन्दर सरस अनुपम प्रत्येक युग्म अविस्मरणीय..जय हो

सदस्य कार्यकारिणी
Comment by शिज्जु "शकूर" on May 9, 2017 at 4:43pm

वाह क्या कहने आ. निलेश नूर भाई लाजवाब, अच्छी ग़ज़ल हुई है

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 4:30pm

शुक्रिया आ. योगराज सर...
आपके अनुमोदन से हिंदी ग़ज़ल का प्रयास सफल लगता है 
सादर 

Comment by Nilesh Shevgaonkar on May 9, 2017 at 4:30pm

शुक्रिया आ. बसन्त जी 


प्रधान संपादक
Comment by योगराज प्रभाकर on May 9, 2017 at 2:33pm

//मंदिरों की सीढ़ियों पर भूख थी  
चन्द्र भिक्षापात्र सा बर्तन लगा. //

//माँ को अम्मी कह रहा था मित्र, बस! 
उसका आँगन अपना ही आँगन लगा.//

वाह वाह वाह, क्या कहने हैं आ० निलेश नूर भाई जी, लाजवाब ग़ज़ल हुई हैI ढेरों ढेर बधाई हाज़िर है, स्वीकार करेंI  

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